तुम दरबारों के गीत लिखो
मैं जन की पीड़ा गाऊँगा.

लड़ते-लड़ते तूफानों से
मेरे तो युग के युग बीते

जो हमेशा बज़्म का हिस्सा रहे हैं
ये समझ लो उम्र भर तन्हा रहे हैं

तुम समझना चाहते हो रुख़ हवा का
हम हवा को रास्ता समझा रहे हैं

सार्थक संध्या नहीं थी आज की ,
बेपरों चर्चा रही परवाज़ की ।

थे वही क्यों थे मगर बातें हुईं ,
कुछ अदीबों के अलग अंदाज़ की ।

कुछ अधूरा सृजन ,बिखरे सपने
कुछ धुंधली यादेँ, बिछड़े अपने
कुछ अश्रु बूंद ठहरी पलकों पर
मन में उभरते कुछ चित्र अधबने
          इनको ज़रा उकेरूं तो गीत लिखूं। 

चालीसवें बसंत पर हूँ
कल रात की ढ़लान के बाद
अभी भी मैं शायद खिला हूँ...
पर जर्जरता क्षीणता तो नियति है।

तुम माँ हो, दुहिता हो,भगिनी, मित्र तुम्हीं ,
जीवन को जीवन दे मात्र चरित्र तुम्हीं ।

तुम सागर हो प्यार -प्रीति का ममता का,
सहिष्णुता सद्भाव ,सौम्यता ,समता का ।

आये फिर लहरों में तिरने के दिन

घोल रही मधुगन्धा मदमाते घोल
इच्छाएँ घूम रहीं बाँध-बाँध टोल
पल्लव से अंतर के चिरने के दिन

जिस रोज तुम्हारी गागर से सतरंगी रंग छलक जाए .
उस रोज समझना धरती पर फिर फागुन आने वाला है

अनसुनी सी रही रात की रागिनी
अनमने से सपन कसमसाते रहे।
हम सजाते रहे छांव के गुलमोहर
वो खड़े धूप में तन जलाते रहे।

आमों पर खूब बौर आए
भँवरों की टोली मँडराए
बगिया की अमराई में फिर
कोकिल पंचम स्वर में गाए

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मुख्य सम्पादक : डॉ. पुष्पलता मुजफ्फरनगर

सह सम्पादक : मिली सिंहराहुल सिंह

प्रबंध सम्पादक : राजेश मंगल

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