हमसे मौसम ने कहा हमने निकाली चादर
जिसमें पुरखों की बसी गंध संभाली चादर

दिन में पूरी थी मगर रात अधूरी - सी लगी
सिर पे खींची तो कभी पांव पे डाली चादर

हमने ओढ़ी तो मगर हमसे बचाई न गई
यों ही कबिरा की कई बार खंगाली चादर

हमसे कुछ लोग कह रहे कि मजारों पे चलो
भर के लाएंगे चढ़ाएंगे जो खाली चादर

कितने लोगों ने यहां यूं भी सचाई को ढंका
देह ढंकने के लिए ओढ़ ली जाली चादर