हर क़दम पर हैं इम्तिहान कई।
है अकेला दिया, तूफ़ान कई।

एक साये को तरसते हैं हम,
यूँ तो सर पर हैं आसमान कई।

दिन में दस बार गले मिलते हैं,
फ़ासले फिर भी दरमियान कई।

हमने पैरों को फ़िसलने न दिया,
रास्ते में मिले ढलान कई।

आशियानों! सतर्क हो जाओ,
बिजलियों ने किये ऐलान कई।

आदमी खाता आदमी को ही,
भेड़िये देखकर हैरान कई।

दिलके ज़ख्मों का हाल मत पूछो,
दोस्ती ने दिये निशान कई।

दर्द-ग़म-बेबसी-घुटन-आहें,
इश्क़ के घर में मेज़बान कई।

थाल पूजा के लेके मत निकलो,
साधुओं में छिपे शैतान कई।

आदमी रोज़ बदलता चेहरा,
आइने फिर भी बेज़ुबान कई।

आदमी ही यहाँ नहीं रहता,
रहते हिन्दू औ मुसलमान कई।

फिर भी इन्सानियत न सीखे हम,
पढ़ लीं गीता कई, क़ुरान कई।

हाथ बन्दर के लग गयी है गुलेल,
होंगे सर फिर लहूलुहान कई।

गाँव के लोग सब ग़रीब रहे,
लखपती हो गये प्रधान कई।

ख़ूब लेते हैं मज़े कृषि-मंत्री,
भूख से मर गये किसान कई।

हाले-दिल सारा हमने कह डाला,
फिर भी बाक़ी अभी बयान कई।