अनसुनी सी रही रात की रागिनी
अनमने से सपन कसमसाते रहे।
हम सजाते रहे छांव के गुलमोहर
वो खड़े धूप में तन जलाते रहे।

सांझ आंखों में अंजन सजाए खड़ी।
थी बहुत ही विकल वो मिलन की घड़ी।
प्रीत के गीत थककर सजल हो गए
हम स्वयं ही स्वयं को सुनाते रहे।

रात बेचैन करवट बदलती रही।
उनको पाने की हसरत मचलती रही।
देवता मन के वन में भटकते रहे
और वो मंदिर में दीपक जलाते रहे।

रश्मियां आंख में झिलमिलाती रही।
आस की लौ सदा टिमटिमाती रही।
पथ के कांकर निरंतर उठाते रहे।
वो ना आए मगर हम बुलाते रहे।