जिस रोज तुम्हारी गागर से सतरंगी रंग छलक जाए .
उस रोज समझना धरती पर फिर फागुन आने वाला है

जब कलियों की कंचुकी स्वयं हो जाय विलग उसके तन से
जब चम्पा जूही की कलियाँ शर्मायें भृग के नर्तन से
उस रोज समझना धरती पर ऋतुराज उतरने वाला है

जब अनचाहे कंगना खनके कागा बोले जब आंगन में
जब मुरझाये मन कुसुम खिले अनगिन बसंत हो जीवन में
उस रोज समझना परदेशी प्रीतम घर आने वाला है

जब सर से घूंघट खिसक खिसक ढल जाये तेरे मुखड़े से
तुम मुह में उंगली तनिक दबा मुस्काओ हौले हौले से
उस रोज समझना पूनम का चन्दा मुस्काने वाला है ..