तुम माँ हो, दुहिता हो,भगिनी, मित्र तुम्हीं ,
जीवन को जीवन दे मात्र चरित्र तुम्हीं ।

तुम सागर हो प्यार -प्रीति का ममता का,
सहिष्णुता सद्भाव ,सौम्यता ,समता का ।

वत्सलता की प्रतिमा हो गरिमा की खान,
तुम्हीं गुरू हो अल्पज्ञों को देती ज्ञान।

तुम्हीं सत्य हो, शिव हो, सुंदर थाती हो,
अंधकार में घर की दीया- बाती हो ।

सुख -दुख में उत्थान- पतन में निर्विकार ,
करुणा ,क्षमा, दया ,सेवा की प्रति अपार ।

अलसाई पलकों को तुम लोरी के बोल,
द्रवित -नयन से भी आंचल में अमृत घोल।

तुतलाते शब्दों की अमृतवाणी हो ,
निर्विकार, निस्पृह निर्झर, कल्याणी हो ।

यौवन की सहचरी, प्रणय का आलिंगन,
रस -रंजित रसना अधरों का मृदु चुंबन ।

जीवन पथ के पग-पग का प्रतिबिंब तुम्हीं,
ग॔तव्यों पर सद्य -प्रकाशित बिंब तुम्हीं।

तुम कमनीय भावनाओं की भाषा हो,
जीवन का तुम अर्थ, तुम्हीं परिभाषा हो।

तुम अंधे की लाठी ,साधन ,सम्बल हो,
प्रवहमान ,गतिमान धार-सी अविरल हो।

तुम पर्वत -सी अडिग, मेखला चंदन की,
वंदनीय , श्रद्धेय, पात्र अभिनंदन की।

तुम राधा हो कभी ,कभी तुम सीता हो,
तुम हो वेद -पुराण ,ज्ञान की गीता हो।

तुम प्रतीक हो हर समाज के चिंतन की,
तुम्हीं प्रेरणा- स्रोत , दृष्टि उनमन मन की।

धर्म- ध्वजा लेकर के न्याय सिखाती हो ,
तुम अबोध को भी इंसान बनाती हो।

तुम कर्तव्य - परायणता की हो मिसाल,
अन्नपूर्णा , तुम्हीं काल पर महाकाल ।

ज्ञानी , मुनी, यती, ॠषियो ने मानी हार ,
चारित्रिक -गुण हैं अभेद्य नहिं पारावार ।

तुम , दुर्गा , चंडी हो और महाकाली ,
रौद्र- रूप -धर न्याय- नीत की रखवाली।

नारी तुम जीवन में जीवन का आधार ,
नारी ब्रह्म -स्वरूपा ले सर्जन का भार।

नारी ,देव - रूपिणी है पूजा का पात्र,
नारी तुम केवल श्रद्धा हो श्रद्धा मात्र ।