चालीसवें बसंत पर हूँ
कल रात की ढ़लान के बाद
अभी भी मैं शायद खिला हूँ...
पर जर्जरता क्षीणता तो नियति है।

मैं इसे चाहकर भी टाल‌ नहीं पा रहा
क्योंकि नश्वर देह
माना आज कोमल है
कल नहीं रह सकेगी
इसकी जीर्णता क्षीणता भी
तयशुदा है जो आकर रहेगी
फिर भी!

मैं टाल देना चाहता हूँ
उमरदराज़पन
थकान
उम्र की ढ़लान
मैं टाल देना चाहता हूँ
दो और दशकों तक...
मैं कमलदल सम भरा
पूरा खिला हुआ ही ठीक लगूँगा
मैं नहीं चाहता
इस देह पर सलवटें, झुर्रियाँ
मैं नहीं मानना चाहता
यह अटल सत्य कि...
देह जर्जर हो चली है
मेरी देह भी अब थकने लगी है
अनवरत यात्रा से दुखने लगी है
रोज़मर्रा की
ज़िंदगी में पिसने लगा हूँ
कई बार सड़कों पर हुई
दुर्घटनाओं, हादसों को
मैं टाल लेना चाहता हूँ
इस थकान को
उम्र की ढलान को
अंतिम शैय्या और श्म़शान को
और तीन दशकों तक
मैं यूँ ही...
भरपूर खिला रहना चाहता हूँ
मैं अब भी टाल रहा हूँ! एक सच।

आखिर अटल और शाश्वत
सत्य है मृत्यु जिसे
अधिक देर तक टाला न जा सका है।


आत्मवेदना के तीसरे संस्करण में

जानता हूँ तुम कम बोलती हो
अनकहा अक्सर आँखों से तोलती हो
तुम्हारी ख़ामोश निगाहों को
यूँ तो पहले दिन
हम ही पढ़ सके थे
इन एकटक
गहराती आँखों की भाषा
ये तुम्हारी नज़र हैं कि
ज़र्रे ज़र्रे पर नज़र रखती है
ये नज़रे बारहाँ क्यूँ
हम पर ही टिका करती है
ये झुकती हैं ये गिरती है
हम पर ही उठा करती है
दास्तां-ए-इश़्क
कुछ हमसे ब़यां करती है
आज उन आँखों में ही
एक अजीब शिकन देखी है
अनकहा सा मौन
अनसुलझी सी बेचैनी देखी है
मौन‌ होकर भी सच बोलती है आँखें।।

आँखें तो कह रही हैं कि तुम्हें हम पर एतबार है।