कुछ अधूरा सृजन ,बिखरे सपने
कुछ धुंधली यादेँ, बिछड़े अपने
कुछ अश्रु बूंद ठहरी पलकों पर
मन में उभरते कुछ चित्र अधबने
          इनको ज़रा उकेरूं तो गीत लिखूं। 

कुछ मधुरिम पल मेरेअतीत के
कुछ स्वर, राग,छंद भी संगीत के
भावों पर लगे प्रतिबंधों ‌‌ के
कुछ उलझे से धागे संबन्धों के
          इनको ज़रा लपेटूं तो गीत लिखूं।

प्रतिक्षण उफनते संवेगों को
अंतर में उबलते आवेगों को
अति चपला नृत्य की थिरकन को
व्याकुल हृदय की धड़कन को
          इनको ज़रा सहेजूं तो गीत लिखूं।

जो चाहा वो कभी मिला नहींं
जो मिला वो तो चाहा ही नहीं
ना जानी क्या रीत प्रीत की
ना समझ पाई चाह मीत की
          इनको ज़रा समझूँ तो गीत लिखूँ।

रेशे रेशे उड़ते बादल सा
नीर भरे नयनों के काजल सा
धुआँ धुआँ होते अरमानों का
तिनका तिनका सब पहचानों का
          इनको ज़रा समेटूं तो गीत लिखूँ।