पुस्तक - "दूब का बन्दा"
लेखिका- "डॉ पुष्पलता "

आदरणीया डॉ पुष्पलता जी का उपन्यास दूब का बन्दा पढ़ा अभी। उपन्यास के नायक द्वारा अंत में ये कहना कि "अपने दादू की इज्जत कभी कम नही होने देगा।। उसे दूब का बन्दा मिल गया" बहुत सुंदर, 60 पेज का सहज सुखद, सामयिक प्रभाव शाली, विचारणीय, प्रेरक, सही दिशा-निर्देश देने वाला, बाल मन को प्रभावित कर उसे रास्ता दिखाने वाला।

पुस्तक -"पानी की देह"
लेखिका- "डॉ पुष्पलता अधिवक्ता मुजफ्फरनगर "

प्रख्यात एवं वरिष्ठ लेखिका "डॉ पुष्पलता" का काव्य 'पानी की देह' मुझे pdf के द्वारा मिली, डॉ पुष्पलता एक उच्चकोटि की लेखिका है। आपकी अनेक पुस्तकें मन का चांद, अरे बाबुल काहे को मारे, खंडकाव्य एक और अहल्या, एक और वैदेही, एक और उर्मिला आदि जिनके लिए अनेक पुरस्कार पा चुकी हैं।

अनेक बार "दुक्खम-सुक्खम" पढ़ने की इच्छा हुई क्योंकि जिस कृति को व्यास पुरस्कार मिला वह निश्चित ही अद्भुत होगी इसकी उम्मीद थी। गूगल पर सर्च की नहीं मिली तो ममता कालिया दी से ही पूछा। पता चला प्रतिलिपि डॉट कॉम पर है ।पढ़ना शुरू किया तो लगा ये तो मेरी कहानी शुरू हो गई है।

प्रखर अनुभूतियाँ लिए गर्मजोशी, उतेजना, गहरी भावुकता से अपनी बात कहता है नवगीत। इसमें सहज मार्मिक संवेदना होती है। नवगीत प्रकृति और आधुनिकता से प्रेरणा प्राप्त करता है। कौंधती स्मृतियों के जरिये बिम्ब गहरे उतर जाते हैं मन में।

प्रेम चंद ने सही कहा था "कहानी वह ध्रुपद की तान है जिसमें गायन महफ़िल शुरू होते ही अपनी प्रतिभा दिखा देता है।" मुझे तेजेन्द्र शर्मा की कहानियाँ पढ़ने का अवसर मिला।

"भोर विभोर" अनिता सक्सेना जी का अनुभवों, सुखों दुखों की भावभूमि पर रचा रचना संसार है। जीवन को भोर के रूप में आत्मसात करने वाली रचनाकार की रचनाएँ वास्तव में भाव विभोर करती हैं, उनकी रचनाओं में ऊर्जा, उमंग, मानवीयता है।

डॉ. सुधा ओम ढींगरा का उपन्यास 'नक़्क़ाशीदार केबिनेट' पढ़ा। स्त्री अस्मिता पर जैसे सम्वेदनाओं की नक़्क़ाशी जड़ दी है। पुस्तक हाथ में लेने के बाद पाठक को पकड़ लेती है। बिना पूरी पढ़े वह उसे रखता नहीं है।

हिंदी की प्रगतिशील कविता भारतीय सामाजिक अंतर्विरोध से पैदा होकर निरंतर गतिशील यथार्थ और परिवर्तित राजनीतिक स्थितियों के घात प्रतिघातों से उत्पन्न हुई है। मुक्तिबोध ने इन घात-प्रतिघातों को बहुत नज़दीक से महसूस किया था। उनकी कविताओं में इसकी गूंज़ हमें बराबर सुनाई देती है। 

कई महीने से रखी आदरणीय वेद प्रकाश "वटुक "की पुस्तकें पढ़ना चाह रही थी। मगर व्यस्त रही। आज उनकी एक कृति "शहीद न होने का दुख" पढ़ी। वेद प्रकाश 'वटुक' जी के पास कल्पनाओं का बहुत बड़ा आकाश है।

साहित्य अपने समय का सहचर नहीं, साक्ष्य भी होता है। विसंगतियों, कुरूपताओं पर उसकी सीधी नजर होती है। चन्द्रशेखर शर्मा ‘शेखर’ के काव्य संग्रह ‘अवसर अभी शेष है’ को पढ़ते हुए यह सच्चाई बराबर कौंधती है कि तमाम कानूनों, दावों और प्रभावों के बावजूद मौजूदा व्यवस्था में स्त्री जाति के हिस्से में यातनाएँ ही यातनाएँ हैं।

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डॉ पुष्पलता अधिवक्ता मुजफ्फरनगर
253-ए, साउथ सिविल लाइन,
मुजफ्फरनगर-251001 (उ.प्र.)

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मुख्य सम्पादक : डॉ. पुष्पलता मुजफ्फरनगर

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