मुजफ्फरनगर के नवीन मंडी स्थल पर प्रातः भ्रमण और संध्या भ्रमण के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। अपने मित्रों के साथ एक शाम मैं भी वहां घूमने चला गया। वहां मेरी दृष्टि बहुत सारे ऐसे बछड़ों पर पड़ी जिनका कोई मालिक नहीं था, सब अपनी अपनी मर्जी के मालिक थे।

कुछ बछड़े अपने ग्रुप में बैठे हुए थे, कुछ खड़े हुए थे तो कुछ उदर पूर्ति के लिए इधर-उधर घूम फिर रहें थे।

इन सब से अलग एक छोटा सा बछड़ा चुपचाप एक दीवार की बगल में खड़ा हुआ था।उसके सामने हरे चारे की छुट्टी पड़ी हुई थी पर वह चर नहीं रहा था जबकि भूख से उसका पेट पिचका हुआ था। मैं उस बछड़े के पास जाकर खड़ा हो गया और लगातार उसकी ओर देखता रहा तो ऐसा लगा कि"जुबां खुली भी ना थी और बात भी कर ली"

संध्या भ्रमण के पश्चात मैं घर लौटा, खाना खाया और सो गया। रात को सपने में वही छोटा बछड़ा आकर कहने लगा"अंकल आप मुझे मेरी मां के पास पहुंचा दो। मुझे अपनी मां की बहुत याद आ रही है। भूख के कारण मेरे प्राण निकले जा रहे हैं, घास खाना मुझे अभी आता नहीं है। मां के दूध से अच्छा मुझे और कुछ भी नहीं लगता है। मेरी याद करके मां भी बहुत रोती होगी। मैं वहां का रास्ता नहीं जानता हूँ इसलिए आप मुझे वहां पहुंचा दो। प्लीज अंकल प्लीज।

मैंने कहा"तुम अकेले यहां पहुंचे कैसे? तुम तो अभी बहुत छोटे हो"

वह कहने लगा"अंकल हमारा मालिक बड़ा निर्दयी आदमी है वह ही मुझे यहां छोड़ कर गया है। मैंने कहा बच्चे तुम अपनी कहानी विस्तार से बताओ।

वह बताने लगा "अंकल जी मैं सच कह रहा हूँ । मुझे कभी भी पेट भर कर अपनी मां का दूध नहीं पीने दिया गया। दूध निकालने के लिए सुबह शाम जब मुझे खोला जाता तो मैं दौड़ कर अपनी मां के थनों से चिपक जाता था। कभी-कभी तो इस जल्दबाजी भरी दौड़ में फिसल कर गिर भी जाता था। जैसे ही मां के थन मेरे मुंह में होते मां अपना सिर घुमा कर मुझे चाटने लगती थी। मैं बार-बार सिर मार-मार कर संकेत देता था कि मां अभी दूध नहीं आया है जल्दी कर बहुत तेज भूख लग रही है मां। मेरी भोली मां नहीं जानती थी कि जो दूध अपने लाडले के लिए थनो में उतारा है, उसे उसके बच्चे को नहीं पीने दिया जाएगा। मुझे खींच कर खूंटे से बांध दिया जाता और हमारा मालिक पूरा दूध निचोड़ कर गौ रक्षा कमेटी के अध्यक्ष के हवाले कर देता था। यह धोखा हम मां बेटे के साथ रोज होता था।

एक दिन मुझे बहुत तेज भूख लगी। मां मेरी दशा देखकर दुखी होती रही, पर कुछ कर नहीं सकती थी क्योंकि हम दोनों मजबूत रस्सों से बंधे हुए थे। मैंने अपना प्रयास जारी रखा और धीरे-धीरे मेरा रस्सा खुल गया।

मैंने बिना देर किए मां का सारा दूध गटागट भी डाला।

जब मालिक को पता चला तो वह क्रोध में आग बबूला हो गया। उसने मुझे घसीट कर दूर बांध दिया और एक डंडे से मां को पीटना शुरू कर दिया। अंकल जी, मैंने सुना है गाय के शरीर में 33 करोड़ देवताओं का वास होता है लेकिन जब मेरी मां के शरीर पर डंडे पड़ रहे थे तो उस समय किसी देवता को दया नहीं आई। मुझे तो लग रहा था कि पिटाई के डर से देवता भी भाग खड़े हुए होंगे। अपने ही बच्चे को दूध पिलाने की एक मां को इतनी बड़ी सजा मिलेगी, यह अगर मुझे मालूम होता तो मैं दूध ही नहीं पीता। थोड़ी देर बाद मेरा नंबर आया, मालिक ने अपना बचा हुआ गुस्सा मुझ पर उतार दिया।

गले में रस्सा बांधकर खींचते, पीटते, घसीटते मुझे यहां गुड मंडी में लाकर छोड़ दिया। अंकल, एक दो बातें आपसे और पूछना चाहता हूँ ईमानदारी से जवाब देना।

पहली बात तो यह है कि जब हम किसी की अम्मा का दूध नहीं पीते तो फिर आप लोग हमारी मां का दूध क्यों पी जाते हो? मेरे विचार से केवल मनुष्य ही ऐसा जीव है जो बूढ़ा होने तक औरों की मां का पीता रहता है। इनकी कुछ माताएं तो अपना फिगर बिगड़ जाने के भय से अपने बच्चे को दूध ही नहीं पिलाती हैं।

आप स्वयं बताओ जब आपके बच्चे हुए थे तब उनकी मां के दूध से एक कप चाय भी बनाई थी क्या? नहीं ना, सारा दूध बच्चे ने ही पिया, लेकिन हमारी मां के दूध से तो मावा, दही, पनीर, रबड़ी, मक्खन, खीर, और न जाने क्या-क्या बना डाला। मुझे यह सब कुछ बुरा लगता है किंतु सबसे बुरा तो तब लगता है जब लोग मेरी माता को अपनी माता बताने लगते हैं। चलो मैं मान भी लूँ कि गाय तुम्हारी माता है तो फिर जिसे अनाथालय में छोड़ आए हो उससे आपका क्या रिश्ता है?

यूँ तो दूध का धंधा करने वाला कोई साधु संत नहीं है।

पर हमारे मालिक की क्रूर गाथाओं का कोई अंत नहीं है।।

एक घटना सुनाता हूँ --

हमारे साथ एक भैंस बुआ जी रहा करती थी। उनका बच्चा भी मेरी उम्र का ही था। हम दोनों एक ही खूंटे से बंधे रहते थे, जब भूख लगती तो एक दूसरे को चाट लेते थे। चाटने से खुजली तो दूर हो जाती परंतु भूख दूर नहीं होती थी। भूख के कारण वह अधिक दिन तक जिंदा नहीं रह सका मेरे सामने ही उसके प्राण निकल गए।

उस रोज बुआ जी ने दूध नहीं दिया तो उन्हें बड़ा लंबा इंजेक्शन लगाया गया। फिर तो यह इंजेक्शन वाला काम रोज होने लगा। देखते ही बुआ जी डर जाती थी और डर के मारे जीभ निकाल देती थी।

आप मनुष्य लोगों ने बहुत ही झूठा प्रचार किया हुआ है कि गाय का दूध पीने से बुद्धि बढ़ती है। अगर यह बात सच होती तो हर बछड़ा पंडित बना बैठा होता जबकि ऐसा है नहीं उल्टा जब भी मूर्खता की तुलना करनी होती है तो बैल और गधे से ही की जाती है।वे लोग हमें बहुत अच्छे लगते हैं जो कहते हैं कि गोमूत्र पीने से बहुत सारी बीमारियां दूर हो जाती हैं। गाय का मूत्र पीने वालों से हमें कोई शिकायत नहीं है, बाल्टी भर- भर के पियो और 100 साल जियो किंतु हमारी मां का दूध केवल हमारे लिए छोड़ दो।

अब मैं आपको उस दिन की याद दिलाता हूँ जिस दिन मुझे इस मंडी में लावारिस हालत में लाकर छोड़ दिया गया था। इस घटना के दूसरे दिन आप लोगों की 26 जनवरी थी। बछड़ों को भी उस दिन कुछ लोगों ने हरा चारा डाल दिया था। तेज आवाज में एक गीत भी बज रहा था"बैलों के गले में जब घुंघरू जीवन का राग सुनाते हैं"इस गाने को सुनकर एक छोटा बछड़ा बड़े बछड़े से पूछने लगा"भैया, यह बेल क्या होता है? बड़े भाई ने बड़े गर्व से बताया"देखो भाइयों, हमारे पूर्वज बड़े होकर बैल बनते थे, जिनका किसान लोग बड़ा सम्मान करते थे, गोवर्धन पूजा के साथ-साथ बैलों की पूजा भी होती थी। लेकिन हम बदनसीब इस गुड़ मंडी में घूमते- घूमते ना गुड़ बन पाते न खांड।बैल बन सके ना सांड।।

मेरा तो सभी से यही कहना है कि:--

"चलो यार उस क्षेत्र में जहां मिले कोई गाय।
दर्शन दुर्लभ हो गए,जोबन बीता जाय।।

आप लोग मेरे साथ यह भजन गाइए,

"बिन गैया हमारी भगवान, उमरिया कईसे कटे
पन्नी खईके हुए हम जवान उमरिया कैसे कटे।

शहरों में हमरी जरूरत नहीं है,
गांव में कोई भी पूछत नहीं है
डंडा मारे हैं अब तो किसान।

उमरिया कैसे कटे।

भोजन और भजन के बाद सभी बछड़े बैठकर जुगाली करने लगे। मैं सबसे अलग चुपचाप खड़ा हुआ था अंधेरा छाने लगा, तभी काले कपड़े पहने दो आदमी मेरे पास आए और मुझे उठा कर अपनी गाड़ी में डाल दिया। गाड़ी चल पड़ी, मुझे अपनी मुक्ति का मार्ग दिखाई देने लगा। तभी कुछ लोगों ने गाड़ी रुकवा कर मुझे उतरवा लिया और फिर इसी मंडी में छोड़ दिया।"अंकल जी प्लीज आप मुझे मेरी मां के पास पहुंचा दो।

यह सपना में गहरी नींद में देख रहा था, तभी एक कर्कश आवाज मेरे कानों में पड़ी। पत्नी जोर-जोर से कह रही थी"आज सोते ही रहोगे क्या? दूध भी तो लाना है"

मैंने घड़ी देखी, सुबह के 6:00 बज रहे थे। मैं तुरंत दूध लेने के लिए चल पड़ा।आज पहली बार मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं दूध लेने नहीं बल्कि डकैती डालने जा रहा हूँ।

दूधवाले के पास पहुंच कर पता चला कि गाय ने 3 दिन से दूध नहीं दिया है। वैसे मैं भी तीन-चार दिन के बाद ही दूध लेने आया था। दूधवाला बताने लगा"बाबू जी डंगर पाल ना कोई आसान काम नहीं है। यहां आपको ऐसे लोग भी मिल जाएंगे जिनका नाम तो है गोपाल और पाल रखे हैं कुत्ते।

देखो जी मेरा नाम तो देशपाल है।

पूरे देश को तो पाल नहीं सकता पर इस दूध से अपने बच्चों को तो पाल ही रहा हूं। इस गाय का बछड़ा बड़ा हारामी था, अभी दो-तीन दिन पहले की बात है कि किसी तरह से खुल गया और सारे दूध को डकार गया मुझे आया गुस्सा और साले को गुड़ मंडी में छोड़ कर आ गया। ले अब लालाओं का खून पी ।तीन दिन से अपने पुत्र की याद में इसकी माताश्री ने दूध ही नहीं दिया हड़ताल किए बैठी है।

मैं बिना दूध लिए भागकर घर आया दूध का डोल रखा और जा पहुंचा नवीन मंडी स्थल अर्थात गुड़ मंडी में। लेकिन मेरे पहुंचने से पहले ही मेरे सपनों का वो साथी यात्रा पर निकल चुका था, उस अनंत यात्रा पर जहां से हमने किसी को भी वापस आते नहीं देखा। मैं भारी मन और नीली आंखें लिए घर लौट आया।