घोर कलयुग आ गया है ।एक ही बेटा है और कुछ कमी भी नहीं है,इतनी ज़मीन-जायदाद..... ...?

"राम-राम ऐसा अनर्थ तो न कभी देखा,न सुना।

पहली बार ऐसा अनोखा खेल अपने समाज़ में हो रहा है।

जितने मुँह, उतनी बातें, हर कोई खुसुर-फुसुर करने में लगा हुआ था।"

बेटी बार-बार उठती कुछ बोलने के लिए लेकिन भाई इशारे से उसे कुछ भी न बोलने के लिए मना कर देता ।

इस दृश्य को बहुत देर से मनोरमा जी,देख रही थी। ग़मगीन माहौल और इतनी देर तक लोगों की बातों ने उन्हें बोलने के लिए मज़बूर कर दिया।

मनोरमा जी,उठीं और हाथ जोड़कर बोली-

"देखिए आप सबसे मेरा निवेदन है कि इस प्रकरण पर अब यहाँ कोई चर्चा न करे। इससे उनकी आत्मा को बहुत तकलीफ़ पहुँचेगी। जो कुछ भी हो रहा है,वह सब उनकी इच्छा से ही हो रहा है, उनका स्वभाव कैसा था, यह तो आप सबको पता ही है।"

उनकी इच्छा क्या थी,वह क्या चाहते थे, यह सब कुछ आप लोग जान भी कैसे पाएंगे? इतने दिनों से वो बीमार थे लेकिन तब किसी के पास समय नही था, कि आकर उनके पास बैठते, उनसे बातें करते,उनका हाल-चाल पूछते उनका थोड़ा सा मन बहलाते,जिसके लिए वो तरसते हुए चले गये।

अब वह जब हमेशा के लिए चले गये हैं,तो तेरह दिन के लिए आप सबके पास समय आ गया, लेकिन अब इस समय का औचित्य ही क्या है?

ज़जमान गरूण पुराण तो बहुत आवश्यक है, वह तो होना ही चाहिए। पंडित जी ने अपने दमदार आवाज़ में समझाने की कोशिश की।

मनोरमा जी,बिना भीड़ की चिन्ता किए ही बोल उठीं- "पंड़ित जी, भगवान ने हमारे रिश्तेदारों को खूब दिया हैं, ज्ञान और धन दोनों, कोई भूखा नही है, इसलिए अब इस तेरह दिन का सब कर्मकांड तो होगा लेकिन भोज़न गरीबों और भूखों के पेट में जाएगा।

"लोग दूसरों की नकल करते हैं। मनुष्य सभी प्रकार का ज्ञान अर्जित कर स्वयं का एवं अन्य का भी कल्याण कर सकता है। मनुष्य की अच्छी वृत्ति ही सद्गति है, यानि जो भी हम कार्य करते हैं, अगर उसके प्रति हमारी मनोकामना सच्ची है तो नर में भी नारायण बनने की शक्ति है।"

बहुत देर से चुप्पी साधे बेटी बोल उठी, मम्मी सही कर रही हैं। यह सब बातें पिता जी,ही हमें सिखाकर गये हैं। आकाश सर्वत्र व्याप्त रहकर भी किसी से नही मिलता, वैसे ही जो लोग ज्ञानदृष्टि से क्षेत्र व क्षेत्रज्ञ का भेद तथा मोक्ष क्षेत्रज्ञ का उपाय जान लेते हैं, वे परमपद् को पा लेते हैं।

इसलिए अब हम लोग पिताजी की मृत्यु के नाम पर कुछ भी अनावश्यक कर्मकांड नहीं करेंगे।