जिम्मेदारियों के पहाड़ ने मनोहर लाल को बीमार कर डाला उनको रात दिन जवान बेटी की शादी और शिक्षित बेटे की नौकरी की चिंता सुकून नहीं लेने दे रही थी।

बेटी की शादी और बेटे की नौकरी के लिए मनोहर लाल के पास जमाधन में मात्र ईमानदारी के प्रशंसा पत्र ही एकत्रित थे।

बीमारी से ग्रस्त मनोहर लाल चिंतन की सिलवटें लेकर ऑफिस जाते और घर वापस आते हाँ बाहर उन्हें ईमानदारी पर कितना भी सम्मान मिल रहा हो मगर अपने घर में प्रवेश करते ही मिलता था शिकवे और शिकायत का पुलिंदा और परिवार द्वारा उड़ाई जाती थी उनकी ईमानदारी के नाम पर खिल्लियाँ।

एक दिन दफ्तर जाते वक्त सड़क पार करते हुए मोहनलाल ने स्वयं चार पहिया वाहन से टकरा कर तोड़ दिया दम और बचाए रखा काले दाग से अपनी इमानदारी की चादर को और 55 वर्षीय ईमानदार मोहन लाल ने पल भर में ही कर दी बेटी की शादी और बेटे की नौकरी की व्यवस्था और मृत्यु पश्चात उनके स्थान पर मिल गई बेटे को नौकरी और बीमा की रकम से हो गई बेटी की शादी।