टी.वी. पर प्रवासी मजदूरों के पलायन और मारा-मारी का हाल देखकर मैं बार-बार सोचता हूं कि कितने नासमझ और बेवकूफ हैं ये लोग, क्या इन्हें कोरोनावायरस की महामारी का अभी तक पता ही नहीं चला या अपनी जान की बिल्कुल भी चिन्ता नहीं।

ये लोग जो दस-बीस साल से इन महानगरों में रह रहे हैं, फिर क्यों छोड़कर निकल पड़े अपने नीड़ को..... मरने के लिए? क्या फिर से लौटकर नहीं आयेंगे ये यहां, जो बसा-बसाया घर-रोजगार छोड़कर जा रहे हैं.....? जब सरकारें इन्हैं मुफ्त का राशन और पैसा भी दे रही है तो फिर क्यों है ये मारा-मारी ...... आखिर क्यों? यह प्रश्न बराबर मेरे जेहन में कोंधता रहता है।

सुबह-सुबह बाहर कालबैल बजी,
कौन आ गया ऐसे में........?
देखा बाहर एक ४०-४२ की आयु की महिला खड़ी है।
हां बताओ..... मैंने प्रश्न किया।
जी कुछ मदद कर दो?
क्या मदद चाहिऐ और कहां से आयी हो तुम,क्या कुछ काम नहीं करते?
जी हम पुराने कपड़ों से बर्तन बदल कर बेंचते हैं ,अब लाकडाउन है ,काम बन्द हो गया , मैं बरेली की रहने वाली हूॅ जो कुछ पास में था खा पी लिया दो महीने में ,अब दो दिन से भूखे हैं बच्चों को चीनी पानी में घोलकर पिला रहे हैं , आप जो भी मदद करना चाहें......?
क्या तुम्हैं सरकार की तरफ से राशन नहीं मिला और कोई मदद नहीं मिली...?
जी पहले महीने मिला था ।
कितना...?
जी दो किलो चावल,तीन किलो गेहूं और एक पाव दाल मिली थी ,बस एक बार....ही ।
और पैसा ....?
जी पैसा- वैसा कुछ नहीं मिला।
कहां रहती हो तुम ?
जी कच्ची सड़क पर।
और यहां इतनी दूर शहर के दूसरे छोर पर क्यों आयी हो....?
जी हम कमाने खाने वाले हैं,इधर ही घूमकर अपना कारोबार करते हैं ...... यह सोचकर ही इधर आयी हूं कि कोई पहचान करके शायद मदद कर दे..... अन्जान जगह तो जा भी नहीं सकते साहब ..... पता नहीं कोई चोट्टी (चोरनी)ही समझ बैठे....?
देखो ..... हम सरकारी अधिकारी हैं .... हमारी जानकारी में है कि सरकार की तरफ से गरीब आदमी के लिए हर महीने एक आदमी के पांच किलो गेहूं, तीन किलो चावल और एक किलो दाल मिली है, और ५०० रू० भी खाते में भी भेजा जा रहा है। मैंने उसके किसी झूंठ बोलने की संभावना को जांचना चाहा।
साहब आप जांच करा लें ...... जो हमने बताया उससे अधिक कुछ मिला हो तो आप हमें सजा दिलवायें। अगर आप हमें इजाजत दिलवा दें व जाने की कोई व्यवस्था हो जाये तो हम तो आज ही बरेली चले जायेंगे।
मैं अब निरुत्तर था।
मुझे अपने ज्वलंन्त प्रश्न का उत्तर मिल गया था।
मेरी पत्नी ने कभी उससे बर्तन तो न बदले थे पर बर्तनवाली के रुप में इसकी पहचान की थी, फिर उसने उसे थोड़ा चावल व दस रुपया दिया, लेकर वह चुपचाप आगे बढ़ गई......... शायद किसी दूसरे ....पुराने ग्राहक की तलाश कर ...... उसके सामने अपने अस्तित्व का प्रश्न रखने.......?