जीवन का सबसे खूबसूरत हिस्सा बचपन को माना गया है। आजकल बच्चों के लिए अनेक तरीकों के नये-नये खिलौनों और गेम्स की भरमार है, वहीं अच्छे साहित्य और फिल्मों का अभाव है। बच्चों के लिए काफी कुछ लिखा भी जा रहा है और छप भी रहा है।

हिंदी बाल साहित्य का इतिहास प्राचीन है और इसके विशाल भंडार में कहानी, कविता, उपन्यास, नाटक, निबंध, साक्षात्कार, यात्रा वृतांत, पत्र लेखन आदि विविध विधाओं के साथ बाल साहित्य गरिमा के साथ प्रतिष्ठा पा रहा है।

बच्चों के लिए लिखा जा रहा साहित्य बाल साहित्य की श्रेणी में रखा जा सकता है। इस सदी में प्रचूर मात्रा में बाल साहित्य का सृजन हुआ है। विचार आया कि क्यों न वर्ष 2020 में प्रकाशित बाल साहित्य का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया जाए। हमने फेसबुक, व्हाटसएप ग्रूप व व्यक्तिगत रूप से भी बाल साहित्य सृजकों से वर्ष 2020 में प्रकाशित बाल साहित्य का विवरण उपलब्ध करवाने का अनुरोध किया। सहृदयी रचनाकारों ने तुरन्त जानकारी भेज कर सहयोग किया उनका आभार! कई साहित्यकारों को दो-दो बार याद भी दिलाया, पर उनका असहयोगात्मक व्यवहार दुःखी भी कर गया। शायद बाल साहित्य पर किसी अदने से रचनाकार का काम करना उन्हें अच्छा नहीं लगा। बाल साहित्य के क्षेत्र में स्वयम्भू विशेषज्ञों, मठाधिशों की कोई कमी नहीं है। किसी रचनाकार के अच्छे कार्य की प्रसंशा करना, सहयोग देना, प्रोत्साहित करना उन्हें नहीं सुहाता। बाल साहित्य के क्षेत्र में संचालित कई फेसबुक/व्हाटसएप ग्रुप के संचालक तो अपने आप को ही महान विशेषज्ञ मानकर आत्ममुग्ध हैं। जबकि बाल साहित्य को बच्चों तक पहुंचाने में इनकी कोई रुचि नहीं हैं। ग्रुपों में भी सभी वरिष्ठ साहित्यकार ही जुड़े होते हैं और चर्चाएं ,विमर्श करते रहते है। एक दूसरे की रचनाओं की समीक्षा चलती रहती है। नवोदित रचनाकार तो ग्रुप में टिक ही नहीं पाता। प्रतिभागी के रूप में वह बालक नदारद ही है जिसके लिए बाल साहित्य लिखा जा रहा है।

बहरहाल इस आलेख में उन्हीं कृतियों पर चर्चा की गई है जिनके रचनाकारों द्वारा हमें विवरण उपलब्ध करवाया गया है। जिन कृतियों की जानकारी उपलब्ध नहीं हो सकी , उनके रचनाकारों से सविनय क्षमा। इसआलेख के लेखन के पीछे हमारा मन्तव्य यही रहा है कि वर्ष 2020 में प्रकाशित बाल साहित्य से हमारे पाठक व शोधार्थी परिचित हों। वर्ष 2020 बाल साहित्य के क्षेत्र में उत्साहित करने वाली उपलब्धियों से पूर्ण रहा है जिसमें कहानी, कविता, उपन्यास, नाटक, पत्र, यात्रा वृतांत, आलोचना के साथ साथ संपादित साहित्य की भी प्रमुखता रही है। और सभी कृतियां सुंदर चित्रों से सजी बच्चों ही नहीं बड़ों के लिए भी पठनीय हैं।

कहानी बाल साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा है। वर्ष 2020 में बाल कहानियां विपुल मात्रा में सृजित हुई और पुस्तक रूप में भी प्रकाशित, चर्चित हुई। राजस्थान साहित्य अकादमी, केंद्रीय साहित्य अकादमी, भारत सरकार के प्रकाशन विभाग से सम्मानित वरिष्ठ बाल साहित्यकार गोविंद शर्मा (संगरिया) के 'पेड़ और बादल' एवम 'गागर में सागर' दो बाल कहानी संग्रह प्रकाशित हुये हैं जिनमें पर्यावरण संरक्षण के तहत सरल, सहज भाषा में मनोरंजक तरीके से जल, जंतु, वायु और वृक्ष बचाने की प्रेरणा दी गई है तो दूसरी पुस्तक में अपने से छोटों की सहायता करने की सीख है। पटियाला की ख्यातनाम रचनाकार सुकीर्ति भटनागर का कहानी संग्रह 'सैर चाँद की' में विज्ञान और कल्पना का सार्थक प्रयोग करते हुए प्रेरक बाल कहानियां संकलित की गई हैं। पवन पहाड़िया (डेह, नागौर ) का 'सुबह का भुला, और गोविंद भारद्वाज (अजमेर) का 'नये दोस्त' कहानी संग्रह के पात्र रोजमर्रा के जीवन से आते हैं जो बालकों में वैज्ञानिक तर्क शक्ति का विकास करते हुए उनमें पर्यावरण संरक्षण, नैतिक शिक्षा, स्वच्छता, राष्ट्र प्रेम की सीख देते है। वर्षा ढोबले (भोपाल) का 'नटखट बन्नी', अलका प्रमोद का 'छुट्टी की मस्ती', सुशीला शर्मा (जयपुर) के 'हौसले की उड़ान' एवम 'सोने का पेड़' ऐसे खूबसूरत बाल कहानी संग्रह हैं जो सत्य घटनाओं पर आधारित है और इनकी प्रत्येक कहानी कोई न कोई सीख देती है वहीं इनमें भाषा की रोचकता, सहजता, सरलता पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

'डिजायनर घोसला' ख्यातनाम रचनाकार शिखरचंद जैन (कोलकाता) का पहला बाल कहानी संग्रह है, जिसकी भूमिका लिखने का सौभग्य मुझे प्राप्त हुआ है। इस संग्रह में प्रकृति, प्रदूषण विज्ञान एवम सामाजिक व्यवहार से सम्बंधित जानकारी बहुत ही रोचक तरीके से देने का प्रयास किया गया है। इस संग्रह में अंग्रेजी वाक्यों का भरपूर प्रयोग किया गया है। आज का बालक इसी प्रकार की भाषा पढ़ना पसंद करता है। डॉ. विमला भंडारी (सलूम्बर ) का 'उड़ने वाले जूते' एक ऐसा ही कहानी संग्रह है जिसकी सभी कहानियां एक से बढ़कर एक हैं। इनमें विषय की विविधता है और प्रस्तुतिकरण की रोचकता भी। ये कहानियां उपदेश और नैतिक शिक्षा के बोझिल वातावरण से इतर जहां एक ओर बच्चों के मन की कल्पना को पंख प्रदान करती हैं, वहीं उन्हें रोचक ढंग से महत्वपूर्ण जानकारियां भी प्रदान करती हैं। 'साधु और जादूगर' हरीश कुमार 'अमित'(गुरुग्राम) का बाल कहानी संग्रह है जिसमें रोमांचक और मनोरंजक घटनाओं द्वारा एक अद्भुत जादुई संसार की सैर कराई जाती है। ख्यातनाम बाल साहित्यकार परशुराम शुक्ल (भोपाल) की पुस्तक 'मनोरंजक एवम ज्ञानवर्धक बाल कहानियाँ', ओमप्रकाश क्षत्रिय 'प्रकाश' का ' चाबी वाला भूत', पवन कुमार वर्मा (शिवपुर) का 'दादाजी को मौन व्रत', सुधा तैलंग (भोपाल) का 'सयानी मुनिया' , इंजी. आशा शर्मा (बीकानेर) का 'डस्टबिन में पेड़' एवं रंजना शर्मा (भोपाल) का कहानी संग्रह 'नानी की बाल कहानियाँ' भी चर्चित रहे हैं। बच्चों के प्रिय कहानीकार संजीव जायसवाल 'संजय' का 'चंदा गिनती भूल गया' संग्रह अलग अलग भाषाओं में प्रकाशित हुआ । 'माशी की जीत’, प्रख्यात साहित्यकार डॉ. शील कौशिक (सिरसा) का बाल कहानी- संग्रह है। इस संग्रह में न राजा-रानी हैं, न राजकुमार- राजकुमारियाँ, न परियों की जादुई कारगुजारियाँ और न ही कल्पना के हवाई किले। इनमें है बच्चों का अपना परिवेश, उससे जुड़ीं समस्याएँ और उनका कारगर समाधान। बाल मनोविज्ञान को ध्यान में रखकर लिखी गई इन कहानियों में घर है, परिवार है, मित्र है, शिक्षक है और है प्रकृति का सानिध्य। वर्तमान दौर में बच्चों-बुजुर्गों के मध्य बढ़ती दूरियों को पाटने की लेखिका ने पुरजोर कोशिश की है।

दुनिया भर में कोरोना का आतंक है। इस काल के परिवेश को शब्दों में ढालने का अनुपम प्रयास अनिल कुमार निलय ने बाल केंद्रित कहानी संग्रह 'लॉकडाऊन पॉजिटिव' में किया है। यह निर्विवाद सत्य है कि दुनिया की हर जीवित भाषा के पास कहानियों के खजाने हैं।वे कहानियां जो मौखिक रुप से पीढ़ी दर पीढ़ी कही -सुनी जाती रही है जिन्हें हम लोक कथाओं के रूप में जानते हैं ऐसी कुछ लोककथाओं को ओमप्रकाश क्षत्रिय 'प्रकाश' (रतनगढ़) ने 'देश-विदेश की लोक कथाएं' शीर्षक संकलन के रूप में प्रकाशित किया है तो प्रदीप कुमार शर्मा (रायपुर) के बाल कहानी संग्रह 'संस्कारों की पाठशाला' में पंचतंत्र की तर्ज़ पर लिखी गई रोचक कहानियों को संकलित किया गया है।

बाल कहानियों की तरह ही बच्चों को गीत-कविताएँ बहुत पसंद होते हैं। गीत -कविताओं के माध्यम से बच्चों को बहुत कुछ सिखाया जा सकता है। मैंने वर्ष 2020 में प्रकाशित अनेक बेहतरीन बाल काव्य कृतियों में से प्राप्त कुछ संग्रहों की जानकारी पाठकों को देने का एक छोटा सा प्रयास किया है तो बाल काव्य के रचनाकारों की रचनात्मक क्षमता का संकेत भर देने की कौशिश भी की है। बाल साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर घमंडीलाल अग्रवाल (गुरुग्राम) के 'गीत भारतीय दिवसों के', 'गीत भारतीय त्यौहारों के' एवम 'बालमन की रोचक ग़ज़लें' शीर्षक तीन बाल काव्य संकलन प्रकाशित हुए हैं। सत्यवीर नाहड़िया (रेवाड़ी) के तीन बाल काव्यसंग्रह आये है जिनमे 'पंचतत्व के वीर' में बाल दोहावली के माध्यम से पर्यावरण के घटक, पर्यावरण असंतुलन के तथा संरक्षण के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया गया है वहीं 'रचना नया इतिहास' में आध्यात्मिक, सांस्कृतिक एवं स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाने वाले विशिष्ट व्यक्तियों के संदर्भ में दोहों द्वारा प्रेरक जानकारी दी गई है। तीसरा 'दिवस खास त्यौहार' कविता संग्रह प्रकाशित हैं जिसमें पर्वों, उत्सवों,जयन्तियों पर बाल मन के अनुरूप रोचक शैली में जानकारी दी गई है। शिव मोहन यादव (कानपुर) के कविता संग्रह 'उड़ने वाली कार' में गाई जाने वाली छोटी-छोटी रोचक बाल कविताओं को संग्रहित किया गया है। श्यामा शर्मा (कोटा) की बाल काव्य कृति 'कोई गीत सुनाओ ना' बालमन के विभिन विषयों पर सरल भाषा मे लिखे गीतों का संग्रह है। रेखा लोढ़ा 'स्मित' (भीलवाड़ा) के बाल कविता संग्रह 'चुन्नू-मुन्नू थे दो भाई' की कविताओं में बाल सुलभ सीख-सिखावन व चरित्र निर्माण की बातें हैं तो बाल सुलभ मस्ती भी है वहीं ख्यातनाम वरिष्ठ साहित्यकार, चिंतक जिंतेंद्र निर्मोही (कोटा) का 'वन्य जीवों की पहचान' बालकों को वन्य जीवों के बारे में संपूर्ण जानकारी सरल कविताओं के माध्यम से देने के साथ ही उनमें वन्य जीवों के प्रति अनुराग जगाने का एक अनूठा प्रयास भी है।

संतोष कुमार सिंह (मथुरा) के 'रुपयों वाला पेड़' एवं ', 'मनभावन शिशु कविताएँ' बाल कविता संग्रहों में ज्ञानवर्धक व मनोरंजक कविताओं को प्रकाशित किया गया है तो आपका ही तीसरा कविता संग्रह 'पुस्तकों वाला गाँव' है जिसमे सूचनात्मक बाल साहित्य को रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। बाल कविता संग्रह 'स्वच्छ रहे परिवेश हमारा' के द्वारा डॉ.आर.पी. सारस्वत (सहारनपुर) ने बालकों को स्वच्छता के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया है। वहीं इनका कोरोना काल मे सृजित कविता संग्रह 'सुन लो दादू' भी बच्चों के लिए प्रेरक व मनोरंजक है। जयसिंह आशावत (नैनवां, बूंदी) के कविता संग्रह 'चिंकू-टिंकू दो बंदर', शिवानन्द सिंह 'सहयोगी' का संग्रह 'अक्कड़-बक्कड़' एवं अनिता श्रीवास्तव (टीकमगढ़) का 'बंदर संग सेल्फी' बालगीत संग्रह संभावनाओं के नये द्वार खोलते बाल मन की अनुभूतियों को प्रकट करने में सफल रहे हैं। डॉ. रमेश आनन्द का 'बच्चों की दुनिया' एवं डॉ. सतीशचन्द्र शर्मा 'सुधांशु' (बिसौली) का बाल कविता संग्रह 'पोते ने पूछा' भी बहुत पसंद किए गए। ऐतिहासिक चरित्र बालकों को उनका अनुसरण करने के लिए प्रेरित करते हैं। राष्ट्रीय गौरव के प्रतीकों की प्रेरक कथा को काव्य के माध्यम से प्रस्तुत करना अभिनन्दनीय है। बाल मन में राष्ट्रीय मूल्यों को सींचने का अनुपम प्रयास करते हुए तरुण कुमार दाधीच (उदयपुर) ने मेवाड़ की पन्नाधाय के गौरवशाली चरित्र पर अपना बाल खण्ड-काव्य 'महीयसी पन्ना' की रचना की है जो बाल मन में राष्ट्र प्रेम व संस्कारों का बीजारोपण करने में सक्षम है।

हिंदी में बड़े उपन्यासों की तरह बाल उपन्यासों का जन्म भी बीसवीं शती के आरंभ में हुआ। आजादी से पहले बाल उपन्यास लिखे तो गए पर वे बड़ों के उपन्यासों की तरह लोकप्रिय नहीं हो पाए, क्योंकि बालकों की ओर से उनकी कोई मांग नहीं थीं। फिर पत्र -पत्रिकाओं ने धारावाहिक रूप में बाल उपन्यासों का प्रकाशन आरम्भ किया। परिणामतः बाल उपन्यास पाठकों का एक अच्छा-खासा वर्ग तैयार हो गया।आज विभिन्न प्रकार के बाल उपन्यास प्रकाशित हो रहे हैं। प्रसन्नता का विषय है कि पद्मश्री सम्मान से सम्मानित वरिष्ट रचनाकार उषा यादव (आगरा) के चार उपन्यास वर्ष 2020 में प्रकाशित हुए और चर्तित रहे। 'बोलते खंडहर', 'उजली धूप', 'माँ और मैं' एवम 'सातवां जन्म' बालकों के लिए आपके रोचक और प्रेरक उपन्यास है जो बाल मन को प्रभावित कर उन्हें रास्ता दिखाने वाले हैं। पुरातात्विक महत्व के भग्नावशेषों के प्रति देश के बालकों के हृदय में सम्मान व लगाव जगाने वाला उपन्यास है-बोलते खंडहर। डॉ. पुष्पलता (मुजफ्फरनगर/ गाजियाबाद) का उपन्यास 'दूब का बन्दा' बालकों के अनुकूल भाषा शैली में लिखा गया प्रवाह व प्रभावशीलता दर्शाता है।कोई भी पाठक एक बार इस उपन्यास को पढ़ना शुरू करेगा वह पढ़ कर ही छोड़ेगा। 'ऐसा था नानी का बचपन' डॉ. अलका अग्रवाल (जयपुर) का बाल उपन्यास है जिसमें सरल और रोचक शैली में बचपन के अनगिनत प्रेरक किस्से, शरारतें समेटी गई हैं। 'सुल्तान और सुलेमान एवम सात चेहरों का रहस्य' डॉ.मंजरी शुक्ला का एक ऐसा मनोरंजक बाल उपन्यास है जो पाठक के इर्द-गिर्द न सिर्फ फंतासी और कल्पना का संसार रचती है बल्कि कल्पनालोक की उस ऊंचाई तक बच्चों को ले जाती है जहां कुछ भी सम्भव है। कामना सिंह (नई दिल्ली) का बाल उपन्यास 'हम साथ चलेंगे' भी पठनीय, रोचिक है। मधुकांत (रोहतक) का 'गूगल बॉय' रक्तदान के प्रति जागृति देने वाला प्रेरक बाल उपन्यास है।

बाल एकांकी या नाटक बच्चों में अभिनेयता का संचार करते हैं। बच्चों के नाटक तो उन्हें अवसर के अनुकूल आचरण सिखाते हैं। सही दृष्टि से देखा जाए तो बाल एकांकी/नाटकों का उद्देश्य केवल शिक्षा देना ही नहीं, मनोरंजन प्रदान करना भी है। डॉ. विमला भंडारी (सलूम्बर) के संपादन में 'श्रेष्ठ बाल एकांकी संचयन' प्रकाशित हुआ है जिसमे विभिन्न रचनाकारों द्वारा रचित सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं को एकांकियों के कथानक का विषय बनाया गया है। अधिकांश में बालकों को रोचक ढंग से पर्यावरण संरक्षण के प्रति सचेत किया गया है। ये एकांकी बालकों को मानव स्वभाव व चरित्र का अध्ययन-विश्लेषण करना भी सिखाते हैं। मधुकांत (रोहतक) के 'बाल नाट्यमाला' में जीवन की सीख देते, छोटे बच्चों द्वारा मंचित करने योग्य 11 नाटक संग्रहित है।

केंद्रीय साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा 195 कवियों की 518 बाल कविताओं का 'प्रतिनिधि बाल कविता संचयन' शीर्षक से एक वृहद संग्रह प्रकाशित किया गया है। इस संग्रह का संपादन बाल साहित्य के ख्यातनाम हस्ताक्षर डॉ. दिविक रमेश ने किया है। जीवन में बाल साहित्य का विशिष्ट एवम महत्वपूर्ण स्थान है और अब इस तथ्य को हर मंच पर स्वीकार किया जाने लगा है। इसी तरह मंडी, हिमाचल प्रदेश के सुपरिचित युवा साहित्यकार पवन चौहान के संपादन में बाल साहित्य पर एक बेहतरीन पुस्तक आई है -' हिमाचल का बाल साहित्य' जिसे हिमाचल के बाल साहित्य की पहली पुस्तक कहा गया है। इसे एक बेहतरीन प्रयास कहा जा सकता है। हिमाचल के बाल साहित्यकारों और उनके योगदान को रेखांकित करने में पवन चौहान ने काफी श्रम किया है। इस प्रयास का स्वागत किया जाना चाहिए। इसी से प्रेरित हो हर राज्य के बाल साहित्य पर लेखन किया जाना चाहिए।

स्वाधीन भारत में बाल साहित्य और साहित्यकारों की उपेक्षा होती आई है लेकिन रचनाओं की दृष्टि से निःसन्देह इक्कीसवीं शताब्दी स्वर्णिम युग है। आज हिंदी बाल साहित्य अपनी महत्ता सिद्ध करने में सफल हो रहा है। इक्कीसवीं सदी भारत के बच्चोंके उन्नयन और विकास के लिए है। इस सदी में बाल साहित्य का परिमार्जित स्वरूप सामने आया है। श्रेष्ठ लेखन अच्छे रूप में प्रस्तुत हो रहा है जिसका सम्मान हिंदी जगत में हुआ है। राष्ट्रीय विकास धारा के साथ आज हमारा बाल साहित्य कदम से कदम मिला कर चल रहा है।

बावजूद एक दुखद पहलू भी है। बाल साहित्य की पुस्तकें प्रकाशित होने के बाद लेखक अपने आप को गौरवान्वित महसूस करता है। पत्र-पत्रिकाओं में समीक्षा आ जाती है, लोकार्पण कार्यक्रम हो जाते हैं… और तो और बाल साहित्य की पुस्तक पर सम्मान/पुरस्कार का प्रबंध भी हो जाता है।यह जता दिया जाता है कि लेखक ने बाल साहित्य को अमूल्य अवदान दिया है। … क्या कहीं कोई चिंतन होता है कि बाल साहित्य के नाम पर बच्चों के लिए लिखी ये पुस्तकें बालकों तक पहुंच भी पाती है या नहीं? शायद नहीं! वस्तुतः साहित्यिक समारोह/ गोष्ठियों में बाल साहित्य बच्चों तक न पहुंच पाने की चर्चा से आगे नहीं बढ़ पाता। देखा जाए तो बाल साहित्य की पुस्तकें लेखक से लेखक, प्रकाशक, पत्रिका संपादक, समीक्षक व पुरस्कार प्रदाता संस्थाओं से आगे उसके वास्तविक हकदार 'बालक' तक पहुंच ही नहीं पाती। बाल साहित्य पर चिंतन/विमर्श भी वरिष्टजनों तक ही सीमित है। यदि कुछ अपवाद छोड़ दें तो दर्जनों बाल साहित्य की पुस्तकों के लेखक को उसके शहर, गाँव, मोहल्ले के बच्चे तक नहीं जानते-पहचानते।

इंटरनेट, कम्प्यूटर, मोबाइल जैसी उपभोक्तावादी संस्कृति के कारण बच्चों में अच्छे संस्कारों की बजाय कुसंस्कारों का बीजारोपण अधिक हो रहा है। बच्चों को सही दिशा कैसे मिले, चारों ओर कीचड़ फैला है, इनके दाग से बच्चों को कैसे बचाएंगे ? यह काम अच्छा बाल साहित्य ही कर सकता है। बाल साहित्य ही वास्तव में संस्कार साहित्य है। अच्छा बाल साहित्य बच्चों को सही दिशा -निर्देश देने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। आज के साइबर युग में यदि हमने भावी पीढ़ी को स्वस्थ बाल साहित्य उपलब्ध कराने व पढ़ने को प्रेरित करने की जिम्मेदारी नहीं ली तो आने वाली पीढ़ी संस्कारों से विहीन हो जाएगी। साहित्यकारों, शिक्षकों, अभिभावकों को आगे आकर अपने घर, परिवार, गली, मुहल्ले, गाँव, शहर से ही इस पवित्र कार्य की शुरुआत करनी चाहिए। अपने घर के बजट में कुछ राशि बाल साहित्य की पुस्तकों की खरीद के लिए भी रखनी होगी। अपनी ही पीठ थपथपाने से न हम महान साहित्यकार हो जाएंगे, न ही बालसाहित्य के प्रहरी कहलायेंगे। न ही हमारी पुस्तकें पढ़ने वाले कोई होंगे और न ही इक्कीसवीं सदी के बच्चे हमें याद रखेंगे। अभी भी वक्त हैं हम सब चेतें और बाल साहित्य को उसके असली हकदार बालकों तक पहुंचाने के कार्य को एक आंदोलन के रूप में करें।