व्यर्थ हम जिनके लिए भटके, सिसकतीं वे--
नागपाशों में पड़ी मलयज हवाएं हैं ।

अर्ज किया है...

जिन्दगी कुछ तो मशवरा दे दे
धुंध ही धुंध है शुआ दे दे। (1)

उसके नाम की प्रतिध्वनि
किसी स्पंदन की तरह
मन की घाटी में गहरी छुपी रही
और मैं एक दारुण हिज्र जीती रही

बादल आँख मिचोली खेले आंचल फटा बटोरे धूप
छप्पर आसमान सिर ढोए काल डस गया काया रूप ।
हौले पवन बुहारे आंगन द्वार देहरी एक समान ,
रिश्ते डूब गए पानी में अपनों ने छीनी मुस्कान।

तृषा तृप्ति के जलद घनेरे
और शब्द चातक बहुतेरे
गीत हुए ।

सहसा बारिश में सर्द हवा,
आरंभ निशा का हुआ रवां,
वीभत्स ध्वनि में शोर मचाने,
मचले पंछी तब घर को जाने,

कभी सोचा है स्त्री भी एक पौधा ही है --
पर स्त्री को नहीं दिया जाता है इतना सत्कार ...
एक पौधे को रोपने के बाद दिया जाता ...
खाद पानी और रौशनी भी ---

तुम दरबारों के गीत लिखो
मैं जन की पीड़ा गाऊँगा.

लड़ते-लड़ते तूफानों से
मेरे तो युग के युग बीते

जो हमेशा बज़्म का हिस्सा रहे हैं
ये समझ लो उम्र भर तन्हा रहे हैं

तुम समझना चाहते हो रुख़ हवा का
हम हवा को रास्ता समझा रहे हैं

सार्थक संध्या नहीं थी आज की ,
बेपरों चर्चा रही परवाज़ की ।

थे वही क्यों थे मगर बातें हुईं ,
कुछ अदीबों के अलग अंदाज़ की ।

सम्पादक मंडल

मुख्य सम्पादक : डॉ. पुष्पलता मुजफ्फरनगर

सह सम्पादक : मिली सिंहराहुल सिंह

प्रबंध सम्पादक : राजेश मंगल

हमारे लेखक

मुजफ्फरनगर
उत्तर प्रदेश
झाबुआ
मध्य प्रदेश
मेरठ
उत्तर प्रदेश
गाज़ियाबाद
उत्तर प्रदेश
शाहजहाँ पुर
उत्तर प्रदेश

रचना प्रेषित करें

"आखर-आखर" पत्रिका में प्रकाशन हेतु आपकी साहित्यिक लेख, कविता, कहानी, लघुकथा, व्यंग्य, समीक्षा, संस्मरण आदि रचनाएं आमंत्रित है।

प्रकाशन हेतु लेखक अपनी रचना "[email protected]" पर ईमेल कर सकते हैं।

पुस्तक समीक्षा प्रकाशन हेतु पुस्तक की एक प्रति डाक द्वारा निम्न पते पर अवश्य भेजें :

डॉ पुष्पलता अधिवक्ता मुजफ्फरनगर
253-ए, साउथ सिविल लाइन,
मुजफ्फरनगर-251001 (उ.प्र.)

Go to top

 © सर्वाधिकार सुरक्षित आखर-आखर (हिन्दी वेब पत्रिका) || Powered by Aakar Associates Pvt Ltd