महफ़िल पै थी निगाह यही सोचते रहे,
आई किधर से वाह यही सोचते रहे।

उम्मीद कम थी फिर भी भरोसा ज़रूर था,
कोई तो दे पनाह यही सोचते रहे।

प्रहर-दिवस, मास-वर्ष बीते
जीवन का कालकूट पीते.

पूँछें उपलब्धियाँ हुईं
खेलते हुए साँप-सीढ़ी
मंत्रित-निस्तब्ध सो गयी

आग पर पानी
डालकर
राख सुलगाते हैं
कितने कमजोर
हैं, हम जो नाहक
डरकर भाग जाते हैं।

स्मृतियों के वातायन से,
झाँक- झाँक कर मुझे रिझाते।
भावों के झरने नि:सृत हो,
तृषित अधर की प्यास बुझाते।।

हमसे मौसम ने कहा हमने निकाली चादर
जिसमें पुरखों की बसी गंध संभाली चादर

दिन में पूरी थी मगर रात अधूरी - सी लगी
सिर पे खींची तो कभी पांव पे डाली चादर

मेरे आगे वो मंज़र आ रहे हैं।
वो ख़ुद चलकर मेरे घर आ रहे हैं।।

मैं सहराओं के जंगल मे खड़ा हूँ
सफीने पर बवण्डर आ रहे हैं।।

कभी कोशिश जो तेरी मंज़िले नाकाम तक पहुंचे
तभी मुमकिन है तेरी आरजू अंजाम तक पहुँचे

चमकती धूप को तुम अपनी आँखों में बसा रखना
जरूरी तो नहीं हर एक नज़ारा शाम तक पहुंचे

अपरिचित सी गलियाँ
आशंकाओं से भरे बाजार
बैठक में पसरा है मौन
सन्नाटों से भरे हैं स्कूल
वीरान हैं खेल के मैदान.

न तुम देख पाये ना हम देख पाये
ज़माने के हम ना क़दम देख पाये

बहुत देखी दुनिया बहुत देखे मेले
ऐ दुनिया तुझे कितना कम देख पाये

देहरी के बाहर
प्रत्येक पग पर
बनते हैं
नित गहरे

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मुख्य सम्पादक : डॉ. पुष्पलता मुजफ्फरनगर

सह सम्पादक : मिली सिंहराहुल सिंह

प्रबंध सम्पादक : राजेश मंगल

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