हर महफ़िल में, हर मौक़े पर थी दुश्वारी, क्या करते,
भक्तजनों के बीच में रहकर रायशुमारी क्या करते !

संत खड़े जयकार कर रहे, ज्वाला देवी भड़क रहीं,
ऐसे में हम ध्वजा-नारियल-पान-सुपारी क्या करते !

पृथ्वी अरबों साल से घूमते घूमते भी
कभी नहीं निकली हेबिटेबल जोन से बाहर,
सूर्य ने आज तक नही छोड़ी अपनी जगह
चंद्रमा आज भी काट रहा पृथ्वी के चक्कर
उसके अगाध प्रेम में।

हक़ीक़त हो गयी उसको पता तो,
हुआ वो बेसबब हमसे ख़फ़ा तो।

अँधेरे में कोई ग़फ़लत न करना,
वहाँ भी देखता होगा ख़ुदा तो।

आशाओं के बादल सिरजे
नभ के आँगन में
उम्मीदों की पड़ीं फुहारें
पतझड़ जीवन में।

पीड़ा व्यापित है दिग-दिगन्त, सुख थोड़ा है पर दुख अनन्त ;
पतझड़ बगिया में डोल रहा, कैसा वसन्त ? किसका वसन्त ??

आज, 15 अप्रैल है। ...2021 की 15 अप्रैल
आज तुम्हें गए हुए 6 साल हो रहे हैं
बावजूद इसके,

क्या जानूं क्यूं उमड़ा होगा
पहली - पहली बार समंदर ,
बूंद बराबर रह जाता हूं
देख तेरा विस्तार समंदर !

व्यर्थ हम जिनके लिए भटके, सिसकतीं वे--
नागपाशों में पड़ी मलयज हवाएं हैं ।

अर्ज किया है...

जिन्दगी कुछ तो मशवरा दे दे
धुंध ही धुंध है शुआ दे दे। (1)

उसके नाम की प्रतिध्वनि
किसी स्पंदन की तरह
मन की घाटी में गहरी छुपी रही
और मैं एक दारुण हिज्र जीती रही

सम्पादक मंडल

मुख्य सम्पादक : डॉ. पुष्पलता मुजफ्फरनगर

सह सम्पादक : मिली सिंहराहुल सिंह

प्रबंध सम्पादक : राजेश मंगल

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