कितने गीत अनसुने गाये।
कितने मीत अनकहे पाये ।
कितनी आशाएं टूटी और
कितने सपने हुए पराये।
मस्त कबीरा कैसे गाये ।

एक बंदरगाह पर
ता-उम्र लंगर डाल।
ज़िंदगी के पोत ने
यूँ ही बिताए साल।।

न ही शब्द थे न ही जिस्म थे
एहसास थे बस भाव थे
कभी पेड़ की एक छाँव में
रूककर जरा सुस्ता लिए

यह मेरुदंड है न!
जिस पर हम खड़े हैं
वह टूट गया है..
हमसे रूठ गया है

युग बीते!
कितने युग बीते।।

घाव लगे अन्तस में गहरे,
सांसों पे यादों के पहरे।
आशा के मोती की खातिर ,
आकर हम कूलों पर ठहरे।।

याद आ रहा आज वो पहला सफर
जब स्कूटर के पीछे बैठ कर
कर रही थी नाखून से कलाकारी
और थी उम्मीद कि समझ पाऊँ
उन हिज्जे को कि शब्द क्या बोल रहे !

रचना प्रेषित करें

"आखर-आखर" पत्रिका में प्रकाशन हेतु आपकी साहित्यिक लेख, कविता, कहानी, लघुकथा, व्यंग्य, समीक्षा, संस्मरण आदि रचनाएं आमंत्रित है।

प्रकाशन हेतु लेखक अपनी रचना "[email protected]" पर ईमेल कर सकते हैं।

पुस्तक समीक्षा प्रकाशन हेतु पुस्तक की एक प्रति डाक द्वारा निम्न पते पर अवश्य भेजें :

डॉ पुष्पलता अधिवक्ता मुजफ्फरनगर
253-ए, साउथ सिविल लाइन,
मुजफ्फरनगर-251001 (उ.प्र.)

सम्पादक मंडल

मुख्य सम्पादक : डॉ. पुष्पलता मुजफ्फरनगर

सह सम्पादक : मिली सिंहराहुल सिंह

प्रबंध सम्पादक : राजेश मंगल

Go to top

 © सर्वाधिकार सुरक्षित आखर-आखर (हिन्दी वेब पत्रिका) || Powered by Aakar Associates Pvt Ltd