कभी कोशिश जो तेरी मंज़िले नाकाम तक पहुंचे
तभी मुमकिन है तेरी आरजू अंजाम तक पहुँचे

चमकती धूप को तुम अपनी आँखों में बसा रखना
जरूरी तो नहीं हर एक नज़ारा शाम तक पहुंचे

अपरिचित सी गलियाँ
आशंकाओं से भरे बाजार
बैठक में पसरा है मौन
सन्नाटों से भरे हैं स्कूल
वीरान हैं खेल के मैदान.

न तुम देख पाये ना हम देख पाये
ज़माने के हम ना क़दम देख पाये

बहुत देखी दुनिया बहुत देखे मेले
ऐ दुनिया तुझे कितना कम देख पाये

देहरी के बाहर
प्रत्येक पग पर
बनते हैं
नित गहरे

जिस सफर में साथ तुम थे, रहबरी अच्छी लगी
दिल गया तो क्या गया ये रहज़नी अच्छी लगी

उसने मेरी ग़लतियों पर जब कभी डाँटा मुझे
फ़क़्र है माँ आज, तेरी बेरुख़ी अच्छी लगी

हम भी इक धूप के फूल हैं
दिन ढलेगा, बिखर जायेंगे
एक डोली पे सज-सज के हम
अर्थियों पर उतर जायेंगे।

भीड़ भरी इस
नीरवता का
किससे करें गिला

कितने गीत अनसुने गाये।
कितने मीत अनकहे पाये ।
कितनी आशाएं टूटी और
कितने सपने हुए पराये।
मस्त कबीरा कैसे गाये ।

एक बंदरगाह पर
ता-उम्र लंगर डाल।
ज़िंदगी के पोत ने
यूँ ही बिताए साल।।

न ही शब्द थे न ही जिस्म थे
एहसास थे बस भाव थे
कभी पेड़ की एक छाँव में
रूककर जरा सुस्ता लिए

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