न तुम देख पाये ना हम देख पाये
ज़माने के हम ना क़दम देख पाये

बहुत देखी दुनिया बहुत देखे मेले
ऐ दुनिया तुझे कितना कम देख पाये

देहरी के बाहर
प्रत्येक पग पर
बनते हैं
नित गहरे

जिस सफर में साथ तुम थे, रहबरी अच्छी लगी
दिल गया तो क्या गया ये रहज़नी अच्छी लगी

उसने मेरी ग़लतियों पर जब कभी डाँटा मुझे
फ़क़्र है माँ आज, तेरी बेरुख़ी अच्छी लगी

हम भी इक धूप के फूल हैं
दिन ढलेगा, बिखर जायेंगे
एक डोली पे सज-सज के हम
अर्थियों पर उतर जायेंगे।

भीड़ भरी इस
नीरवता का
किससे करें गिला

कितने गीत अनसुने गाये।
कितने मीत अनकहे पाये ।
कितनी आशाएं टूटी और
कितने सपने हुए पराये।
मस्त कबीरा कैसे गाये ।

एक बंदरगाह पर
ता-उम्र लंगर डाल।
ज़िंदगी के पोत ने
यूँ ही बिताए साल।।

न ही शब्द थे न ही जिस्म थे
एहसास थे बस भाव थे
कभी पेड़ की एक छाँव में
रूककर जरा सुस्ता लिए

यह मेरुदंड है न!
जिस पर हम खड़े हैं
वह टूट गया है..
हमसे रूठ गया है

युग बीते!
कितने युग बीते।।

घाव लगे अन्तस में गहरे,
सांसों पे यादों के पहरे।
आशा के मोती की खातिर ,
आकर हम कूलों पर ठहरे।।

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