लिख रही है आज कविता,
लिपि,
अजी ! चुपचाप रहिए |

कभी शाम की तन्हाइयों में
कभी अकेली शामों में
दिल खो जाता है यादों के डेरे में
मैं अपने बिखरे बाल समेटती हूँ
खो जाती हूँ उस मंजर में

मध्य मार्ग के थकित सूत्र और
जन्म मरण की तिब्बती पुस्तकें लेकर चलना श्रेयकर था
लेकिन कोई था जो इन सबसे व्यापक था
जिसे किसी साक्ष्य या प्रमाण की आवश्यकता नहीं थी

जो बेक़सों पे सितम बार-बार करते हैं,
वक़ारे इंस को वो दाग़दार करते हैं।।

अँधियारे आँगन में कोई ,
दीपक बाल गया ।

ले लूँ फिर संकेत तरंगित सागर के उच्छवास से ।
पाऊँ फिर संदेश झुरमुटों में भटके वातास से ।

मात-पिता को बेटे के घर
आकर पड़ा बहुत पछताना !

स्वयं को
खोजने निकला है
फिर से बावरा ये मन
हमें मालूम है इस राह में हैं सैकड़ों अड़चन

अतीत के दंश
वृक्ष बन खड़े हैं ।
शाखाओं की ,
विशालकायता
यमदूत सी लगती है ।।

अभी- अभी रात ने
अपनी काली जुल्फों को समेटा है
अभी- अभी रात ने
अपनी बांहों के बंधन ढीले किए हैं

सम्पादक मंडल

मुख्य सम्पादक : डॉ. पुष्पलता मुजफ्फरनगर

सह सम्पादक : मिली सिंहराहुल सिंह

प्रबंध सम्पादक : राजेश मंगल

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