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रेखा भाटिया
- कविता / ग़ज़ल
कभी शाम की तन्हाइयों में
कभी अकेली शामों में
दिल खो जाता है यादों के डेरे में
मैं अपने बिखरे बाल समेटती हूँ
खो जाती हूँ उस मंजर में
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अनुजीत ‘इकबाल’
- कविता / ग़ज़ल
मध्य मार्ग के थकित सूत्र और
जन्म मरण की तिब्बती पुस्तकें लेकर चलना श्रेयकर था
लेकिन कोई था जो इन सबसे व्यापक था
जिसे किसी साक्ष्य या प्रमाण की आवश्यकता नहीं थी
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आचार्य मूसा खान अशान्त
- कविता / ग़ज़ल
जो बेक़सों पे सितम बार-बार करते हैं,
वक़ारे इंस को वो दाग़दार करते हैं।।
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डॉ ब्रजेश कुमार मिश्र
- कविता / ग़ज़ल
अँधियारे आँगन में कोई ,
दीपक बाल गया ।
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कान्ति शुक्ला
- कविता / ग़ज़ल
ले लूँ फिर संकेत तरंगित सागर के उच्छवास से ।
पाऊँ फिर संदेश झुरमुटों में भटके वातास से ।
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संजय शुक्ल
- कविता / ग़ज़ल
मात-पिता को बेटे के घर
आकर पड़ा बहुत पछताना !
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वत्सला पांडेय
- कविता / ग़ज़ल
स्वयं को
खोजने निकला है
फिर से बावरा ये मन
हमें मालूम है इस राह में हैं सैकड़ों अड़चन
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प्रेमलता
- कविता / ग़ज़ल
अतीत के दंश
वृक्ष बन खड़े हैं ।
शाखाओं की ,
विशालकायता
यमदूत सी लगती है ।।
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कुमार बिंदु
- कविता / ग़ज़ल
अभी- अभी रात ने
अपनी काली जुल्फों को समेटा है
अभी- अभी रात ने
अपनी बांहों के बंधन ढीले किए हैं
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योगेन्द्र दत्त शर्मा
- कविता / ग़ज़ल
हर महफ़िल में, हर मौक़े पर थी दुश्वारी, क्या करते,
भक्तजनों के बीच में रहकर रायशुमारी क्या करते !
संत खड़े जयकार कर रहे, ज्वाला देवी भड़क रहीं,
ऐसे में हम ध्वजा-नारियल-पान-सुपारी क्या करते !