मात-पिता को बेटे के घर
आकर पड़ा बहुत पछताना !

जब से आये, तब से बैठे
बैठक में ही मेहमानों से
थोड़ा बतियाता बेटा फिर
'फोन' लगा लेता कानों से

कहा-' चलूँ , 'अर्जेंट' काम है
चाय पियो, खाना फिर खाना' !

पानी पिला गई थी पहले
लेकर चाय बहू फिर आई
पहले छूकर पाँव गई थी
अब विचित्र ढंग से मुस्काई

सोच रही थी- 'आ धमके हैं
जाने कब तक पड़े निभाना' !

विद्यालय से आया बंटी
लिपट गया दादी-दादू से
सहसा माता हुई कर्कशा
चीखी उसे पकड़ बाजू से

' चेंज' करो फिर करो 'लंच' कुछ
' होमवर्क' भी है निबटाना !

लगा दिया बंटी पर ' मीसा'
तनिक पढ़ाया, अधिक रुलाया
खाना-पीना ठूँस बहू ने
साँझ ढले तक उसे सुलाया

एक कहानी सुन न सका वह
था दादी के पास खजाना !

बेटा लौटा बहुत देर से
दर्द व्यस्तता के दुहराए
थोड़ी बातें कींं निज घर की
सास-ससुर के फिर गुन गाए

सालगिरह पर दिया सलहज ने
भूला नहीं 'गिफ्ट' दिखलाना !

सटे हुए कमरे से आता
लावा उनको गया जलाकर
ऊँचे स्वर में बहू बोलती
बेटा रह जाता मिमियाकर

जैसे-तैसे रात गुजारी
दर्द दमे का पड़ा दबाना !

' दो दिन में ही लौट गए क्यों'
साथी आए याद गाँव के
'ए.सी.' की कब ठंड सुहाती
वे थे आदी नीम-छाँव के

बहू सफाई देती लेकिन
मर्म पड़ोसिन ने सब जाना !

बैठे गुमसुम रहे 'ट्रेन' में
भोग चले दो दिन की कारा
लौट आए क्यों इतनी जल्दी
गाँव यही पूछेगा सारा

मुट्ठी बंद न पड़े खोलनी
ढूँढ रहे थे उचित बहाना !

मात-पिता को बेटे के घर
आकर पड़ा बहुत पछताना !