अँधियारे आँगन में कोई ,
दीपक बाल गया ।

तमसनिशा-सा था यह जीवन ,
मरुथल-सा तपता था यह मन ।
सूने पनघट-सा था अंतर् ,
असह वेदना-सा था हर क्षण ।
पैठ हृदय में नयन-द्वार से ,
जड़ से जीवन में फिर कोई ,
स्पन्दन् डाल गया ।
अँधियारे आँगन में कोई ,
दीपक बाल गया ।

शुष्क हुआ था मानस का सर ,
मृत-सा था अन्तस् का निर्झर ।
प्राण हुए थे बेकल अनमन ,
अस्फुट-सा था आशा का स्वर ।
पतझर में मधुऋतु-सा आकर ,
रीते उर के घट में कोई ,
मधुरस ढाल गया ।
अँधियारे आँगन में कोई ,
दीपक बाल गया ।

श्लथ उर की वीणा झंकृत कर,
निद्रित रागों को जागृत कर।
मलयानिल सा बह कर उर में,
आतप को पावस- सा हर कर,
नवल चेतना तन -मन में भर ।
शिथिलित प्राणों में फिर कोई,
अमरित डाल गया।
अँधियारे आँगन में कोई,
दीपक बाल गया।