कभी शाम की तन्हाइयों में
कभी अकेली शामों में
दिल खो जाता है यादों के डेरे में
मैं अपने बिखरे बाल समेटती हूँ
खो जाती हूँ उस मंजर में

ढलता सूरज अब भी नारंगी रंग में घुलता
शाम के आगोश में समा जाता है
मैं उसे निहारती हूँ ,वह उदास हो
मुझसे कल आने का वादा कर विदा लेता है
मैं घंटों छत पर वही पल यादकर सोचती हूँ

जब तुम्हें मुझसे और मुझे तुमसे इश्क़ हुआ था
तुम्हारे इश्क़ में डूब मुझे खुद से भी इश्क़ हुआ था
तुम मेरी तारीफों में वक्त गवाँते, रश्क किया करते थे
सोचती तुम आम से हो और मैं खास-सी तुम्हें मिली

मेरी हँसी में डूबे तुम मेरी जुल्फ़ों को हौले से मेरे चहेरे से
पीछे हटा देते और प्यार से मेरी आँखों में आँखें डाल कहते
मेरे चाँद को इन घटाओं में न छिपाओ ,मेरी हँसी की खनक,
मेरी पायल की छमछम , मेरी चूड़ियों की खनक
तुम्हारी बाँहों के झूले में हिंडोले लेती मैं ख़ामोश हो जाती
सिमट आती और करीब तुम्हारे ,तुम्हारी साँसों की सुगंध
मुझमें उमंगें भरती ,उस गर्मी में मैं पिघलने लगती और घिर आता
सावन मेरी आँखों में चमक लिए स्वप्निल, तुम स्वप्न दिखाते
मैं बरस पड़ती प्यार की बूँदों से रिमझिम-रिमझिम
तुम्हारी बाँहों में थिरकती बिजली-सी

कभी झूठमूठ का बहाना बना तुमसे दूर छिटक
जा सिमटती थी मुंडेर से, छत के उस कोने में
वहाँ झाँकता नीम का पेड़ गुड़ हो जाता
तुम्हारी मिठास से, तुम मेरी अंगुलियों में अपनी
अंगुलियाँ फँसाकर पूछते
जानती हो अंगुलियों के बीच जगह क्यों होती है
मैं अनजान बनने का ढोंग करती

तुम पूछते कभी हंसों के जोड़े को ताल में देखा है
तुमने खेतों में मोर को पंख फैलाए नाचते देखा है
मैं खो जाती तुम्हारी बातों में कब शाम ढल रात हो जाती
रात को चाँद निकल आता, उसे जलाने को तुम कहते मैं उजली
हूँ ज़्यादा चाँदनी से , मैं तुम्हारे समर्पण को देख तुमसे पूछती
क्यों सितारों की भीड़ में लोग चाँद को प्रेम का देवता कहते हैं
मैं कहती तुम मेरी सुबह हो और मैं तुम्हारा सूरज
तुम कहते मैं तुम्हारी शाम हूँ और तुम मेरा चाँद

मैं आज भी खड़ी रहती हूँ छत पर घंटों वहीं
इंतज़ार में बस मुस्करा भर देती हूँ
तुम मेरी सुबह और मैं तुम्हारी शाम हूँ
लेकिन कभी सोचा नहीं था मेरी सुबह का सूरज
तुम्हारी शामों का चाँद इस तरह नदारत हो जाएँगे
साथ-साथ चलने लगती हैं जब दो ज़िंदगियाँ
दो इंसान नदी के दो किनारे बन जाते हैं
ज़िंदगी समर्पण कुछ अधिक माँग बैठी है शायद
जब बारिशें होती हैं बहुत ज़्यादा, इस उम्मीद से
ख़ुश हो जाती हूँ चढ़ आएगा बाढ़ का पानी
इन किनारों को बहाकर ले जायगा !