तअज्जुब क्या है, मेरा घर अगर वीरान रहता है,
यही अंजाम होता है जहाँ ईमान रहता है.

अजब हालत हैं छत एक, आँगन एक, ज़ीना एक,
मगर एक दूसरे से आदमी अनजान रहता है.

जहाँ पर आदमी की हैसियत बँगले की साइज़ हो,
वहाँ उम्मीद क्या रखना, कोई इंसान रहता है.

उसे हम लोग अपने साथ लेकर क्यूँ नहीं चलते,
सड़क, फुटपाथ पर जो एक हिंदुस्तान रहता है.

वो किसका दर्द समझेंगे, वो किसके काम आएंगे,
हमेशा सोच में जिनके नफ़ा नुकसान रहता है.

वहाँ भी जेब कटती है, वहाँ भी लोग लुटते हैं,
जिन आलीशान महलों में मेरा भगवान रहता है.

मेरे दिल में है तुलसी, जायसी, रसखान की कविता,
जुबाँ पर मीर, ग़ालिब, दाग़ का दीवान रहता है

कभी थमते नहीं हैं पाँव उनके तीरगी में भी,
उजालों की तरफ जिनका हमेशा ध्यान रहता है.