उदासियों पे मुझे आ रहा है प्यार अभी,
ठिठुरती धूप में दिखता है कुछ निखार अभी ||

वो मेरे पास नहीं दूर भी कहाँ है मगर,
इस जगह जिसका मैं करता हूँ इन्तज़ार अभी ||

ये अधबने-से मकाँ और कच्ची दीवारें,
यहाँ से कोसों दूर है रुत-ए-बहार अभी ||

भरी-भरी-सी निग़ाहों में उसका चेहरा है,
करार ले के भी यह दिल है बेकरार अभी ||

अभी तो चढ़ने को पहाड़ सामने हैं बहुत,
क्यों सोचते हो तुम आये कोई उतार अभी ||

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फिर नया कोई बहाना होगा गोया उसको नहीं आना होगा
बात क्या ख़ास कोई और होगी बस मेरा दिल ही दुखाना होगा
आज आँखें ये जल रही हैं बहुत आज फिर उस गली जाना होगा
ये हक़ीक़त है ज़िन्दगी की मियाँ तुम जो कहते हो फसाना होगा
हम नहीं होंगे तो कहेंगे वो कौन उस जैसा दीवाना होगा


बावरियन

मैले कुचले से जर्जर
रेशमी लहंगे को
लांग की तरह लपेट-खौंस
किसी सयानी बिल्ली की तरह
चढ़ गई वह श्यामल देह
मोटे चिकने पीपल के तने पर और
जहाँ से विभाजित होतीं थी
दो मोटी डालियाँ
वहाँ इत्मीनान से बैठ
उसने बीड़ी सुलगाई

होठों में दबा कर
फूंकती हुई बीड़ी को
पहुँच गई ठेठ
लगभग तीस फुट ऊँचाई पर लगे
भँवरा मधुमक्खियों के
छत्ते के पास और
लूगड़ी से ढंक कर अपना चेहरा
बहुत सधे हुये तरीक़े से
बीड़ी का धुआँ छोड़ा
मधुमक्खियों की तरफ़
और पतीली को लगा लिया
छत्ते के नीचे

और ग़ज़ब कि
जैसे इन्तज़ार ही कर रहीं थीं
वे मधुमक्खियाँ
उसके धुआँ वाले इशारे का कि
भन्न भन्न करतीं
उड़ चलीं वे कहीं और
कि सीधे हाथ से
निचोड़ने लगी वह
छत्ते से शहद

बूँद बूँद गाढ़े मधु से
भरती रही पतीली और
बीच बीच में उड़ाती रही
वह बीड़ी का धुआँ

निचोड़ कर
छत्ते से पूरा शहद और
मैण के लिये
छत्ते को तोड़ कर
डालते हुये पतीली में वह
मुस्कराई अपनी कामयाबी पर
उतरते हुये पेड़ से
लूगड़ी में कस कर पकड़े हुये
शहद की पतीली
बहुत सुन्दर दिख रही थी वह
अपनी मुस्कान में