आकाश के बीचो-बीच
चांद का उतरता हुआ रंग
रक्तिम आभा से
परिणत हो जाता है
गहरे स्याह रंग में.

झिलमिलाते हुए तारे
मद्धिम रोशनी में
अंतिम किरण की तरह
नहीं छोड़ना चाहते
आकाश का स्थाई कोना
गहराती हुई रात
तब्दील हो जाती है एक युग में.

चांद और तारों के ठीक नीचे
जागते हुए कलमकार
बनाते हैं कल्पना की तूलिका से
बिम्बों का सहज छविचित्र.

जैसे रात अपनी कालिमा में डूबकर
उतर आती है धरती पर
वैसे ही कलमकार
गढ़ता है नए प्रतिमान
समय की बालुका पर चलकर
वह पहुंच जाता है
चांद की सतह के ऊपर,

धरती पर उतरता हुआ चांद
लेकर आता है
अपने साथ अनेक भाव
जिनमें डूबता - इतराता है
हमारा पूरा परिवेश...


बरगदी छाया से दूर

पुराने बरगद
नहीं पनपने देते नए पौधे
जहां तक छाया रहती है
वहां नहीं उगने देते नई किल्लियां
उसकी आत्महंता जड़े
सोख लेती है धरती की उर्वरा शक्ति
जहां कुछ उग आने की संभावना के इतर
उगने से पहले ही
सूख जाती हैं नवकोंपलें.

फैलती हुई जड़ों की परिधि
विस्तार लेती हुईं उसकी शाखाएं
कद ऊंचे से और अधिक ऊंचा होता हुआ
जहां वह नहीं देखता
अपने आस पास
छोटी- छोटी नव विकसित कोपलें
जो हरियाना चाहती हैं
लेकिन बरगद
आखिरी दम तक
सोख ही लेते हैं उनकी प्राण वायु.

बरगदी छाया से दूर
उगते हुए नये पौधे
धीरे -धीरे उठ रहे हैं ऊपर
अपने आस- पास उग आई नई कोंपलों को
बांटते हैं उर्वरा शक्ति,
धरती में पनपती हुई अनेक तरु शिखाएं
घटित होते हुए समय की असलियत
पहचान ही लेती हैं.

कि बरगदी छाया
आत्ममुग्ध बरगद की एक स्थिति है..