हाथ पसारे, सड़क किनारे
फिरते हैं ये फूल
इन्हें जग करता नहीं क़ुबूल

गँदले कपड़ों में लिपटे हैं
मैल जमी झोली
झिड़के गये, गालियाँ खाकर
लौट चले 'खोली'

ख़ुद से हारे, फिरें उघारे
झरते हैं ये फूल
इन्हें जग ख़ूब चुभाता शूल

चोर, उचक्का अक़्सर सुनना
क्रम ये नहीं थमा
पात्र दया के हैं अबोध ये
इनमें राम रमा

बोझ उठाते, शीशे झारें
डरते हैं ये फूल
इन्हें जग कहता ऊल-जलूल

बेचारे ये नहीं जानते
अपराधी क्यों हैं
छोड़े गये भीड़ में अक़्सर
दुख भागी क्यों हैं

किन पापों का, दंड न जाने
भरते हैं ये फूल
इन्हें जग माने केवल धूल

हाथ बढाओ आगे आओ
मदद करो थोड़ी
पढ़-लिख सभ्य नागरिक हो ये
आस नहीं छोड़ी

किसे पुकारें, किसे निहारें
मरते हैं ये फूल
इन्हें जग पल में जाता भूल ।।


जागो सपने सच करने हैं
लिखनी है तक़दीर

आस लगाये रहती क्यों हो
थामे कोई आकर
नियति बदल दो लिखे भाग्य की
आसमान तक जाकर
टूटी हिम्मत से बोलो क्या
टूटेगी प्राचीर ।

शक्ति-स्वरूपा सबला कर्मठ
खुद से क्यों है हारी
अपनी क्षमता नहीं जानती
फिरती मारी-मारी।

बाँध रही किस-किस चौखट पर
धागे और धजीर

यह संक्रान्ति समय है उठ जा
जगा चेतना अपनी
त्याग फेरियाँ देना जग की
बना स्वयं को नटनी
स्वयं साधना होगा अपना
तीरों भरा तुणीर