युग बीते!
कितने युग बीते।।

घाव लगे अन्तस में गहरे,
सांसों पे यादों के पहरे।
आशा के मोती की खातिर ,
आकर हम कूलों पर ठहरे।।

नेह कलश आंसू से भरते
सुख के सागर रीते-रीते।
युग बीते! कितने युग बीते।।

गहन तिमिर बादल धमकाए ,
बिजली चमके, आस जगाए।
अधर खिले स्मित की रेखा,
काजल नैनों में बलखाए।।

राह निहार रहे हैं तेरी
मरते-मरते ,जीते -जीते।
युग बीते! कितने युग बीते।।

भूल गए झूले सावन के,
रंग बदन के, रूप सजन के।
और हिना की रची हथेली,
सपने बचपन के, यौवन के।

प्रेम सुधा की प्यास बढ़ी है,
रोज हलाहल पीते-पीते।।
युग बीते! कितने युग बीते।।

चाह मिलन की रही अधूरी,
धड़कन से धड़कन की दूरी।
रखती है ये बैरी दुनिया,
मुख में राम, बगल में छूरी।।

तार-तार जीवन की चादर,
रोज रहे हम सीते -सीते।।
युग बीते! कितने युग बीते।।


इक बात कह रहा हूँ.. इक्कीसवीं सदी से ।
मैं आदमी हूँ...मेरी ...चर्चा हो आदमी से ।।

हम साथ जी रहे हैं ... हर लम्हा मर रहे हैं ।
ऐसी भी क्या शिकायत .... उनको है ज़िन्दगी से ।।

ये धड़कनेँ जवाँ हैं अब भी उसी के दम पर ।
शायद कि भूलकर भी निस्बत रही उसी से ।।

फ़िरदौस में गुजारे उनकी फ़िराक़ में पल ।
हर हाल में रहे खुश, हम अपनी बेकसी से ।।

चेहरे पे लोग रखते ... एक दूसरा ही चेहरा ।
कन्धे ये बोझ सर का .... ढोते हैं बेबसी से ।।