एक बंदरगाह पर
ता-उम्र लंगर डाल।
ज़िंदगी के पोत ने
यूँ ही बिताए साल।।

सिंधु की लहरें हमेशा
खा रहीं जो ताव।
जागता मन में उन्हें भी
आँकने का चाव।।

खूब लहराए,
मगर अब तो
थके हैं पाल।।

वह रहा नाना प्रपंचों से
हमेशा त्रस्त।
दूर जलती रोशनी पर
आँख रख अभ्यस्त।।

याद में
लहरा रहे कुछ
रेशमी-से बाल।।

पोत की पाली हुई
नौका गई है छूट।
बीच जल में कर रही है
मछलियों की लूट।।

जर्जरित तन पर
पसारे
पाँख अपने काल।।

फँस गई जैसे हलक में
पोत की भी जान।
ढूँढने दूजी गया जो
नौकरी कप्तान।।

कौन-सी करवट
पड़ेगी अब
शकुनि की चाल।।