हम भी इक धूप के फूल हैं
दिन ढलेगा, बिखर जायेंगे
एक डोली पे सज-सज के हम
अर्थियों पर उतर जायेंगे।

दो ही झोंके हवा के मिले
शाख पर हम भी झूमे-हिले
एक मेला यहीं छोड़कर
हम भी मिट्टी के घर जायेंगे।

इस चमन को समर्पित करें
अपनी हर पाँखुरी की हँसी
खिलखिलाकर न यदि हँस सके
तो बिना मौत मर जायेंगे।

एक मालिन ने आकर हमें
चुन लिया है भरी शाख से
उसके आँचल में लेटे हुए
सोचते हैं किधर जायेंगे।

एक दिन यह चमन छोड़कर
हम कहेंगे विदा-अलविदा
कौन होगा यहाँ पर 'कुँअर'
जिसके लोचन न भर जायेंगे।