देहरी के बाहर 
प्रत्येक पग पर
बनते हैं 
नित गहरे
भंवर नये,
हर अनुभव
सिखाता गया
जीवन - सार ये,
यों
भीतर भी
भीजता था
अंतर्मन;
कभी सागर
नयनों में
कभी गगन
सिर पर
छीजता था...

कि घर की स्त्री होना
जैसे हांडी कोई
चूल्हे चढ़ी,
पक रहा भीतर क्या;
क्या खदबदाता रहा
देर तक
कोई क्यों बूझे,
जो परसा गया
अंत में
उस पर ही तो
हर कोई
रीझता था...

कि सीमा
घर की स्त्री की
तय होती है
जलते तवे पर
सिंकती
रोटी की परिधि से,
मोह का
कच्चा धागा कोई
रखता है बांधकर,
जाना अब और कहां,
जब आंखों ने सीखा
देखना सपना यही,
पिंजरे की मैना का
आसमान
उसकी दृष्टि तक
सींझता था....

कि स्त्रियां पैदा होती हैं
एक देहरी,
एक चूल्हे,
एक पिंजरे के साथ,
या फिर
वे केवल
ताजा गोश्त होती हैं...