मेरे आगे वो मंज़र आ रहे हैं।
वो ख़ुद चलकर मेरे घर आ रहे हैं।।

मैं सहराओं के जंगल मे खड़ा हूँ
सफीने पर बवण्डर आ रहे हैं।।

मेरा अगियार अपने साथ लेकर
मुहब्बत के कलंदर आ रहे हैं।।

ख़ुदारा तिश्नगी की ताब रखना
बुझाने खुद समन्दर आ रहे हैं।।

कहाँ तक आईना बनकर रहूँ मैं
मेरी ही ओर पत्थर आ रहे हैं।।

अगर चारो तरफ हैं दोस्त अपने
कहाँ से इतने खंज़र आ रहे हैं।।

अँधेरों तुमको जाना ही पड़ेगा
अभी सूरज उगा कर आ रहे हैं।।