महफ़िल पै थी निगाह यही सोचते रहे,
आई किधर से वाह यही सोचते रहे।

उम्मीद कम थी फिर भी भरोसा ज़रूर था,
कोई तो दे पनाह यही सोचते रहे।

तनहा खड़ा था सच भी अदालत कीभीड़ में,
कोई मिले गवाह यही सोचते रहे।

सूनी है राह और है गर्दो- गुबार भी,
तनहा तमाम राह यही सोचते रहे।

थे तो बहुत रफ़ीक़ मगर थे न राज़दाँ,
होगा भी क्या निबाह यही सोचते रहे।

थे बेक़सूर और सज़ायाफ़्ता मगर,
ये भी तो है गुनाह यही सोचते रहे ।

अब आइने से गुफ़्तगू मुश्किल हुयी 'स्वरूप',
कोई तो दे सलाह यही सोचते रहे ।