बादल आँख मिचोली खेले आंचल फटा बटोरे धूप
छप्पर आसमान सिर ढोए काल डस गया काया रूप ।
हौले पवन बुहारे आंगन द्वार देहरी एक समान ,
रिश्ते डूब गए पानी में अपनों ने छीनी मुस्कान।

अंध अभावों में आशा के अंकुर, मौसम बदलेगा।
कोई दिन ऐसा भी आए शायद सूरज निकलेगा।

सपने तैर गए आँखों में आँसू में डूबी मुस्कान ,
दर्द सिमटकर भीतर बैठा घुट-घुट पसर गए अरमान।
दुख की होली दर्द दिवाली पूजा पेट प्रबल आघात ,
संबंधों की चादर झीनी उम्र दे गई जर्जर गात।
जीवन भार बहुत है लेकिन कोई तो सम्बल देगा ,
आस-किरन की डोर बँधी है शायद सूरज निकलेगा ।

मन के भीतर बसा समंदर दूर तलक नीला आकाश,
प्यार प्रीति का कोरा कागज मृगतृष्णा सी बुझी न प्यास।
हुआ तथागत मन अनजाने खुद में सिमट गए सम्बन्ध,
जीने की अभिलाषा लेकिन करती रही अलिख अनुबन्ध।
रिश्ते नाते बिन्दु बन गये कोई अंतिम जल देगा,
जिस दिन प्राण पखेरू होंगे उस दिन सूरज निकलेगा।