उसके नाम की प्रतिध्वनि
किसी स्पंदन की तरह
मन की घाटी में गहरी छुपी रही
और मैं एक दारुण हिज्र जीती रही

वेदना, व्याकुलता के मनोवेगों में
त्वरित बीजुरी की तरह उसका प्रतिबिंब
हवाओं में कौंध जाता
और आंखों की मेड़ें
नेत्र जल को तिरस्कृत कर देतीं

मेरे ध्यानाकर्षण के लिए
उसने छोड़ी थीं
ब्रह्मांड में असीम संभावनाएं
तब, शब्दातीत बोल सुनकर
प्रस्फुटित हुई प्रेम की पहली कली
जिसकी सुवास
मेरी पर्णकुटी से उठकर
महकाती रही सारे अरण्य को

वो प्रेयस
अनिद्रा को भी उत्सव बना देता
और उसकी परोक्ष उपस्थिति
अंतःकरण में उठी रहती
किसी संगीत कोविद के आलाप की तरह

उसके संग सहचार का वहन
शब्द, अर्थ, विवेचनाएं
या भाषा के यान
कभी न कर पाए
और मैं निश्चल, निमग्न
समय की नदी में पैर डुबाए
कोशबद्ध करने का दुःसाहस करती रही
उसके अनुराग की पांडुलिपि को
जो आकाश से भी अधिक विस्तृत थी

अंततः एक दिन
‘मेरे होने ’के वृहत पर्वत श्रृंग
विध्वंसित हो गए
और शेष बचा रह गया
एक जंगली श्वेत पुण्डरीक