व्यर्थ हम जिनके लिए भटके, सिसकतीं वे--
नागपाशों में पड़ी मलयज हवाएं हैं ।

था कभी भर लिया आँचल
वचन के निर्गन्ध पुष्पों से
बो गया एहसास वह तन में
वंचना की तीक्ष्ण चुभनों के
सेतु ये विश्वास के दरके हुए सारे
छिन्न अब तो परिचयों की सब शिराएँ हैं।

थरथराती ज्योति-रागिनियाँ
गुम हुईं अंधी गुफाओं में
कल्पना की देह निशिगंधा
दब गयीं हिम की शिलाओं में
पुँछ गयीं नभ से कनेरी रश्मियाँ अब तो
धूम्रवलयी मौन में लिपटीं दिशाएँ हैं।

याद के पाखी उड़े आते
उम्र वन में सांझ-सी ढलती
चेतना की फुनगियाँ लरजें
जब गुलेलें शोर की चलतीं
चोट को सहला रही चुप्पी दिगन्तों की
नींद में खोने लगे अब अलस साये हैं.

चीड़ के ये सुरमई जंगल
लील किरणों की बलाकाएँ
योगियों की ध्यान-मुद्रा में
जप रहे हैं कपट मालाएँ
दूर पर डूबे वनान्तों के शिखर-मन्दिर
काकवर्णी फहरतीं उनकी ध्वजाएँ हैं.