क्या जानूं क्यूं उमड़ा होगा
पहली - पहली बार समंदर ,
बूंद बराबर रह जाता हूं
देख तेरा विस्तार समंदर !

जाने कब से खोज रहा हूं
मिला नहीं माझी तेरे - सा ,
लहर - लहर तरणी है तेरी
लहर - लहर पतवार समंदर !

सोच रहा धरती छूने की
होड़ तरंगों में किस कारण ,
जिस तट पर इंसान बसा है
उससे तुझको प्यार समंदर !

मुझको तो तेरी मर्यादा
पराधीनता ही लगती है ,
यों ही टूट न पाता तेरी
बेचैनी का तार समंदर !

सही बात है तेरे बदले
मैं रत्नाकर होता कैसे ,
सारी दुनिया में फैला है
तेरा कारोबार समंदर !

पता नहीं जलचर सब तेरे
किसके पांव पूजते होंगे ,
छीन लिया है तुझसे मैंने
तेरा हर अवतार समंदर !

अपने मन - अनुकूल सदा ही
शायद मैंने तुझको जाना ,
सुख में अट्टहास लगता है
दुख में हाहाकार समंदर !

शायद कुछ गहराई मिलती
शायद कुछ मोती मिल जाते ,
अगर कहीं तेरा तट होता
अपना भी घर - बार समंदर !

समझ रहा हूं तेरी भाषा
फिर भी भाषा ही मजबूरी ,
वरना हो ही जातीं तुझसे
बातें भी दो - चार समंदर !