आज, 15 अप्रैल है। ...2021 की 15 अप्रैल
आज तुम्हें गए हुए 6 साल हो रहे हैं
बावजूद इसके,

तुम्हारी अनुपस्थिति पत्थर पर उकेरी गई निषप्राण तारीख भर नहीं बन पाई है
बन भी नहीं सकती
यकीन है तुमने स्वयं ऐसा नहीं चाहा होगा
तुम्हारी आंखें तब भी मुझ पर टिकी हुई थी
तब भी तुम मेरी डबडबाई आंखों को
अपनी न उठ पाने वाली उंगलियों से कांछ लेना चाहते थे
जबकि मुझे समझाया जा रहा था
मैं भ्रम में हूं, तुम्हारी देखती हुई आंखें देख नहीं रही हैं मुझे
जानती थी,
सच वह नहीं है जो मुझे समझाया जा रहा
सच वही है
जो मैं महसूस कर रही हूं।
महसूस कर रही थी मैं अपने गालों पर हमेशा की तरह तुम्हारी उंगलियों का स्पर्श
जानती थी,
बर्दाश्त नहीं कर पाते तुम मेरे चेहरे पर घिर आई सलवटों को,
पुछी स्लैट सी घिर आई सियाह उदासी को

तुमने हमेशा चाहा…
मेरे साथ ऐसा कुछ ना हो
जिसे नहीं होना चाहिए था
वह हो गया
तो कैसे हो गया हमारे न चाहते हुए भी!

दिनों ढूंढते रहे हम
उस कुंजी को जो खोल दे उस सांकल को
जिस पर अनचाहे आ लटका है वह ताला
तुम दरके, रिसे, गहरी पीड़ा और पश्चाताप में उभ चूभ होते और मैं,
भीगती रही रातभर अपनी ही आंखों की अनावृष्टि के थपेड़ों में
स्वयं को किसी मजबूत तने में बदलने की कोशिश करते हुए
ताकि तुम्हारा हाथ जब सहारे को मेरे कंधों पर टिके
मैं साध सकूं तुम्हें, साध सकूं स्वयं को
कंधे पर टिके तुम्हारे भरोसे से भरे हाथ को छू कर!

कितना कठिन होता है परस्परता की आंच की जमा पूंजी को सहेजना,
किरचों में तब्दील होतेस्वयं को बटोर ना,
आंचल के कोर में गठिया ना,
संजो कर विश्वास और आस्था की संदूकचियों के हवाले महफूज़ कर
उन पर विवेक के ताले जड़ देना।

सुनो अवध!
किसी को भी जानकर शायद अजीब लगेगा या पागलपन
लेकिन यह सच है
उम्र की सफेदी से भीगी
ज़िंदगी के इस मोड़ पर भी
टहलते हुए किसी जोड़े की अंतरंगता को देखकर
अनायास तलाशने लगती हैं तुम्हारी बाहों को धरने को व्याकुल मेरी रुआँसी हथेलियां!

दूरंदेशी थे तुम बहुत
शायद दूर बहुत दूर चले जाने से पहले जानबूझकर छोड़ गए हो मेरे लिए जरूरी वसीयत
गुज़रे सालों और साथों में गूंथे हुए प्रतिपल हमें विकसित करते उन गुनगुने एहसासों को,
ताकि ना होने दें वह उचाट उस सीमा तक अपनी खरोचों से,
लहूलुहान करने वाले उन बघनखों से
जो अक्सर,
बढ़ आते हैं किन्ही कमजोर क्षणों में जीवटता को सोख लेने को।

होता है,
होता है अवध और ऐसा बार-बार होता है,
संभ्रमित होने के भ्रम को बार-बार बुहारता,
किसी भी कार्यक्रम के लिए निकलते हुए आदतन जा खड़ी होती हूं,
अंतिम बार आईने के सामने देखने के लिए अपनी छवि,
आश्वस्त होने के लिए, कि सब ठीक तो है न!
तभी पाती हूं कि तुम अचानक आकर मेरे पीछे खड़े हो गए हो,
"बिंदी तनिक दाई और खिसकाओ तो चित्तुल… हांऽऽ हां अब ठीक है"
चौंक कर मैं आईने को घूरती हूं…
आईना बदल चुका है तुम्हारी आंखों की पुतलियों में
पुतलियां मुझे कर लेती हैं कंधों से सम्मुख,
रख देती हैं हमेशा की तरह अपने होठों को आहिस्ता से मुंद गई मेरी पलकों पर
और पाती हूं
घर के गेट से बाहर निकलते हुए उठते कदमों में लौट आया है
निकलने से पहले
अनायास मुझसे छूट भागने को अपनी कलाइयां छुड़ाने को कसमसता हुआ, आत्मविश्वास!