युग बीते!
कितने युग बीते।।

घाव लगे अन्तस में गहरे,
सांसों पे यादों के पहरे।
आशा के मोती की खातिर ,
आकर हम कूलों पर ठहरे।।

याद आ रहा आज वो पहला सफर
जब स्कूटर के पीछे बैठ कर
कर रही थी नाखून से कलाकारी
और थी उम्मीद कि समझ पाऊँ
उन हिज्जे को कि शब्द क्या बोल रहे !

आकाश के बीचो-बीच
चांद का उतरता हुआ रंग
रक्तिम आभा से
परिणत हो जाता है
गहरे स्याह रंग में.

जुबानी तीर चल गए
जख्म अभी रिसते हैं
बदले उम्र के कैलेंडर
हम बस दिन गिनते हैं

पुराने ठाँव से रहती है लिपटी ।
गरीबी गाँव से रहती है लिपटी ।

हमारे खेत की मिट्टी है साहब !
हमेशा पाँव से रहती है लिपटी ।

वक़्त की आँखें तुम्हें ही 
ढूँढती हैं 
हो सके तो लौट आओ 

उदासियों पे मुझे आ रहा है प्यार अभी,
ठिठुरती धूप में दिखता है कुछ निखार अभी ||

वो मेरे पास नहीं दूर भी कहाँ है मगर,
इस जगह जिसका मैं करता हूँ इन्तज़ार अभी ||

हमको सिला वफ़ाओं का अच्छा नहीं मिला
हमने जिसे भी टूट के चाहा, नहीं मिला

ताकतवरों के साथ सभी लोग हो लिए
कमज़ोर आदमी को सहारा नहीं मिला

तअज्जुब क्या है, मेरा घर अगर वीरान रहता है,
यही अंजाम होता है जहाँ ईमान रहता है.

अजब हालत हैं छत एक, आँगन एक, ज़ीना एक,
मगर एक दूसरे से आदमी अनजान रहता है.

मेरा ख़याल जो तेरा ख़याल हो जाये
तो खत्म तेरा मेरा हर सवाल हो जाये

मिलें हो काश हमारे तुम्हारे दिल ऐसे
सितम हो तुझ पे मेरी आँख लाल हो जाये

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