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राजेश मंगल

परिचय
नाम
राजेश मंगल
आखर-आखर में प्रकाशित रचनाएं

पीड़ा व्यापित है दिग-दिगन्त, सुख थोड़ा है पर दुख अनन्त ;पतझड़ बगिया में डोल रहा, कैसा वसन्त ? किसका वसन्त ??

  उपन्यास का शीर्षक प्रथम दृष्टया पाठक को किसी नारी के व्यथित जीवन के कथानक का संकेत देता प्रतीत होता है, किंतु यह कथन छह पुत्रियों के पिता का है जो अपनी पुत्री के प्रति स्नेह व उत्तरदायित्व की अभिव्यक्ति को बल देता है।

अस्तित्व
कथा कहानी

टी.वी. पर प्रवासी मजदूरों के पलायन और मारा-मारी का हाल देखकर मैं बार-बार सोचता हूं कि कितने नासमझ और बेवकूफ हैं ये लोग, क्या इन्हें कोरोनावायरस की महामारी का अभी तक पता ही नहीं चला या अपनी जान की बिल्कुल भी चिन्ता नहीं।

कई !
कविता / ग़ज़ल

हर क़दम पर हैं इम्तिहान कई।है अकेला दिया, तूफ़ान कई। एक साये को तरसते हैं हम,यूँ तो सर पर हैं आसमान कई।

प्रहर-दिवस, मास-वर्ष बीतेजीवन का कालकूट पीते. पूँछें उपलब्धियाँ हुईंखेलते हुए साँप-सीढ़ी मंत्रित-निस्तब्ध सो गयी

गीत लाडले
कविता / ग़ज़ल

स्मृतियों के वातायन से,झाँक- झाँक कर मुझे रिझाते।भावों के झरने नि:सृत हो,तृषित अधर की प्यास बुझाते।।

असंदिग्ध लौ
कथा कहानी

आज अचानक मेरे मित्र का वीडियो कॉल आया और मैं सो कर भी नहीं उठी थी इसलिए मैंने फोन नहीं उठाया। लेकिन जब देखा तो खुद को रोक नहीं पाए और रजाई को पलटकर ब्रश करके तुरंत नीचे हॉल में जाकर उन्हें फोन लगा ही दिया।

मुक्तिगान
कथा कहानी

घोर कलयुग आ गया है ।एक ही बेटा है और कुछ कमी भी नहीं है,इतनी ज़मीन-जायदाद........? "राम-राम ऐसा अनर्थ तो न कभी देखा,न सुना। पहली बार ऐसा अनोखा खेल अपने समाज़ में हो रहा है।

हमसे मौसम ने कहा हमने निकाली चादरजिसमें पुरखों की बसी गंध संभाली चादर दिन में पूरी थी मगर रात अधूरी - सी लगीसिर पे खींची तो कभी पांव पे डाली चादर

मेरे आगे वो मंज़र आ रहे हैं।वो ख़ुद चलकर मेरे घर आ रहे हैं।। मैं सहराओं के जंगल मे खड़ा हूँसफीने पर बवण्डर आ रहे हैं।।

आलेख और अधिक ...

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मुख्य सम्पादक : डॉ. पुष्पलता मुजफ्फरनगर

सह सम्पादक : मिली सिंहराहुल सिंह

प्रबंध सम्पादक : राजेश मंगल

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