साहित्य अपने समय का सहचर नहीं, साक्ष्य भी होता है। विसंगतियों, कुरूपताओं पर उसकी सीधी नजर होती है। चन्द्रशेखर शर्मा ‘शेखर’ के काव्य संग्रह ‘अवसर अभी शेष है’ को पढ़ते हुए यह सच्चाई बराबर कौंधती है कि तमाम कानूनों, दावों और प्रभावों के बावजूद मौजूदा व्यवस्था में स्त्री जाति के हिस्से में यातनाएँ ही यातनाएँ हैं।

‘अन्तर’, ‘मूल्यांकन’, ‘एक बोतल सच’, ‘नई दुल्हन के प्रति’, ‘अफसोस’, ‘चाबी की गुड़िया ’, ‘वर्जित फल’, ‘बहू और बेटी’ आदि कविताओं में एक ओर पुरुष वर्चस्व से उद्भूत नारी-विरोधी अवमूल्यों का भयावह यथार्थ है, दूसरी ओर इनके प्रतिवाद की व्यंजना भी मुखर है। ‘अंतर’ और ‘अफसोस’ में बेटी के जन्म पर परिवार की प्रतिकूल प्रतिक्रिया है। कोख को धिक्कारा गया है तो अंतर में बेटे और बेटी को लेकर दोहरा आचरण प्रत्यक्ष है। ‘मूल्यांकन’ और ‘वर्जित फल’ में भ्रूणहत्या की नृशंसता है। गुज़रे ज़माने में जीने का अधिकार पा गई माँ पर भारी दबाव है -

‘अपने गर्भ में’ पल रहे / मादा भ्रूण की / जन्म से पूर्व ही / साँसे रोक देने का।’ ‘चाबी की गुड़िया’ में स्त्री पर पीढ़ी दर पीढ़ी होने वाले अत्याचार की ओर संकेत प्रासंगिक है-

यह होता आया है
सदियों से ही
पहले नानी के साथ
फिर तुम्हारे साथ
अब मेरे साथ
आगे मेरी बेटी के साथ भी
होगा यही

कुछ पाठक वर्तमान स्त्री सशक्तिकरण के दौर में इस विश्लेषण से असहमत हो सकते हैं। लेकिन यह वास्तविकता जमीन की है, उनकी बहुत बड़ी आबादी आज भी उत्पीड़न और तकलीफ भोगने के लिए अभिशप्त है। किन ‘अवसर अभी शेष है’ की कविताएँ मात्र स्त्री-यातना तक सीमित नहीं हैं, वर्तमान समय की कई ज्वलंत समस्यायें और सरोकार भी इनमें प्रतिबिंबित हैं। ‘मृतक का बयान’ में आम आदमी की नियति से वर्तमान व्यवस्था के चरित्र का अनावरण होता है। ‘यह पानी बेचता है’ में बालश्रम को समाप्त करने की श्रमजीवी की इच्छा पूरी नहीं हो पाती है। ‘भटकाव’ में रोजगार के लिए गाँव देश छोड़कर भटक रहे युवाओं का दर्द है तो ‘फासला’ में बच्चों की जिन्दगी में संचार माध्यमों के दखल की विडम्बना है। ‘विलुप्त हो जाएँगे’ में पर्यावरण-प्रदूषण की चिन्ता है और ‘कारगिल की चोटियों’ में राष्ट्रीय स्वाभिमान का तेज है। सबकी पीड़ा हर कर ‘कालिदास और प्रेमचंद’ बनने की लेखकीय आकांक्षा में अन्तर्वस्तु का वैविध्य और परिवेश संप्रक्ति स्वाभाविक है। यह अनायास नहीं है कि ‘संकल्प’ शरीर शक रचना में कवि का संकल्प है -

मानव हित के मानव हो 
अपना कर्तव्य निभाऊँगा

इन कविताओं की भाषा वस्तु के अनुरूप है और ‘कहन’ में व्यंग्य का उपयोग वेधक और सार्थक है। ‘बीसवीं’ सदी का भारत/इक्कीसवीं सदी के इंडिया को/अपने कंधों पर ढोये जा रहा हैं’, ‘हम लोग बेगारी में/आत्महत्या का/सुख जी रहे हैं’ जैसे अवतरणों में भयावहताएँ प्रहार की मुद्रा में व्यक्त हुई हैं। ‘एक बोतल सच’, ‘कटी पतंग की तरह’, ‘चिंता की नदी’ आदि पद अभिप्राय की व्यंजना में सक्षम हैं। समग्रतः ये कविताएँ परिवेश की अंतरंग पहचान और प्रतिरोध भी हैं। डॉ. विष्णु सक्सैना ने उचित ही इनमें एक ‘सकारात्मक उत्साह’ को रेखांकित किया है, जिससे इनका ‘विज़न’ दीप्त है।

पुस्तक: अवसर अभी शेष है
लेखक: कवि डॉ. चंद्रशेखर शर्मा शेखर
प्रकाशक - दीक्षा प्रकाशन, गंगा विहार, दिल्ली-94, प्रथम संस्करण