जैसा कि नाम से ज़ाहिर है "तीरगी से लड़ता रहा" तीरगी यानी अंधेरा हमारी राह में आने वाली रुकावटों का प्रतीक है और डॉ राम गोपाल भारतीय की ग़ज़लें उस चिराग़ का प्रतीक हैं,

उन जुगनुओं का प्रतीक है जो अपनी सारी ऊर्जा के साथ रात भर रोशनी के लिए संघर्ष करते हैं जो अंधेरों से डट कर मुकाबला करते हैं और अंततः सूरज के दामन से सुबह की किरन अवश्य फूटती है। इसी किताब का शीर्षक ग़ज़ल का शेर है-

चराग़ जुगनू बना रोशनी से लड़ता रहा।
वो रोशनी के लिए हर किसी से लड़ता रहा।

बात करते हैं ग़ज़ल की, ग़ज़ल उर्दू शाइरी की सबसे मक़बूल विधा है । यह फ़ारसी से उर्दू और हिंदी में आई है । ग़ज़ल के मक़बूल होने की एक वजह ये भी है कि जिस बात को कहने के लिए किसी दूसरी विधा में कई वरक़ सियाह करने पड़ते हैं वही बात ग़ज़ल के एक शे'र में कह कर मंज़र-ए-'आम पर रख दी जाती है, आज ज़ियादातर हिंदी के कवि भी ग़ज़ल में तबअ आज़माई कर रहे हैं, ये अलग बात है कि वो क्या लिख रहे हैं ।जब सैलाब आता है तो बहुत सा कूड़ा कचरा भी बह कर आ जाता है । वक़्त उसे छान फटक कर अलग कर देता है और गौहर अपने दामन में सँभाल कर रख लेता है । डॉ राम गोपाल भारतीय जी वही गौहर हैं ।

ग़ज़ल पहले कुछेक चंद मज़मून- इश्क़, मुहब्बत, हिज्र, विसाल, शिकवा-शिकायत, साक़ी- पैमाना, सुर्ख़ रुख़सार, गुल-ओ-बुलबुल के दायरे में महदूद थी और बाहर निकलने के लिए छटपटा रही थी । यह जिस महबूब की दास्तान की रिदा ओढ़े हुए थी वह कुछ पुरानी हो गयी थी। क़रीब पाँच दशक पहले दुष्यंत कुमार से ग़ज़ल का दूसरा दौर शुरू हुआ दुष्यत कुमार ने ग़ज़ल का फॉर्मेट तो वही रहने दिया लेकिन ग़ज़ल का विषय बदला , क़दीमी रवायत और तग़ज़्ज़ुल को बरक़रार रखते हुए जदीद मज़ामीन में ढल कर जो ग़ज़ल का रूप निखर कर मंज़र-ए-'आम पर आया है वो अवाम को बहुत पसंद आया, जो ग़ज़ल महलों की ज़ीनत थी वो आज 'आम आदमी की पहुँच में है ,मज़दूर की बात, ग़रीबों की संवेदनाएँ, सियासत की चालें सब कुछ ग़ज़ल ने अपने मे समेट लिया है और हर बात ग़ज़ल में कही जा सकती है यानी ग़ज़ल का दामन पहले से बहुत वसीअ हुआ है। हिंदी, उर्दू में भी सिर्फ़ लिपि का फ़र्क़ है । हिंदुस्तानी ज़बान आज लिपि की मोहताज़ भी नहीं है । ग़ज़ल हर ज़बान में कही जा रही है । कवि को समाज से जो मिला है या जो वो अपने आसपास महसूस करता है,जो भोगता है वही अपने शब्दों में ढाल कर आपको लौटा देता है, इसी किताब में एक शे'र है -

हम आदमी से नहीं पत्थरों से डरते हैं,
हैं जिनके पास में पत्थर गुलाब क्या देंगे

दुष्यंत कुमार की उसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए डॉ राम गोपाल भारतीय की ग़ज़लों में दबे कुचले लोगो का दर्द,उनकी सम्वेदनाएँ उभर कर सामने आती है उनकी ग़ज़लें देवनागरी में लिख दी जाएँ तो हिंदी की और नस्ता'लीक़ लिपि में लिख दी जाएँ तो उर्दू की लगने लगती हैं । डॉ राम गोपाल भारतीय जी किसी त'अर्रुफ़ के मोहताज़ नहीं हैं । आप की ग़ज़ल,गीतों की अनेक पुस्तकें और क्रान्तिधरा मेरठ के कवियों पर शोध ग्रंथ प्रकाशित हो चुका है आकाशवाणी से आप मुसलसल काव्यपाठ करते रहते हैं । स्तरीय पत्र पत्रिकाओं में आपकी ग़ज़लें प्रकाशित होती रहतीं हैं । कितने ही अवार्ड और सम्मान आपकी झोली में आकर सम्मानित हो चुके हैं प्रस्तुत ग़ज़ल संग्रह 'तीरगी से लड़ता रहा' आपका नयी ग़ज़लों का संग्रह है

शायरी का त'अल्लुक दिल से है । शाइर जब तन्हा होता है तो उसके दिल के दरवाज़े खुल जाते हैं, एक विराट कैनवास पर ख़्यालात के नक़्श उभरने लगते हैं और अल्फ़ाज़ ख़ुद ब ख़ुद रक़्स करते हुए अशआर में ढलने लगते हैं तब 'तीरगी से लड़ता रहा' जैसी तख़लीक़ शे'री मजमूए की शक्ल में मंज़र-ए-'आम पर छा जाती है । ये अशआर देखिए

ये मत देखो सफर में रास्ता सीधा हो समतल हो।
तुम्हारे पांव में चलने की ताक़त भी मुसलसल हो।
तुम्हारे साथ चलते लोग पँहुचे आसमानों तक,
उसूलों को लिए बैठे हो लगता है कि पागल हो।

आज के मसाइल पर भारतीय जी की पैनी नज़र है और हालात को बदलने का जज़्बा उनके पास है । उनके अशआर में एक नयापन है, ताज़गी है और इस दुनिया को और ख़ूबसूरत बनाने का ख़्वाब उनकी आँखें मुसलसल देखती रहतीं हैं । मसलन ये अशआर -

आप भी बन के दिया राह में जलते रहिए।
इन अंधेरों को उजालों में बदलते रहिए ।
ठोकरें लाख सही पाओगे मंज़िल एक दिन,
शर्त इतनी है कि गिर गिर के संभलते रहिए।

भारतीय जी की ग़ज़लें पाठकों को ऐसे भावालोक में ले जाती हैं, जहाँ पहुँचकर उनकी ग़ज़लें अपनी न होकर पाठकों की हो जाती हैं। वे अपना रचना-संसार और संवेदनाओं को, विराट फ़लक पर यथार्थ से जोड़ देती हैं । इसी किताब से कुछ अशआर देखिए -

हर ओर तरक़्क़ी का ये कैसा बहाव है।
हर शख्स के चेहरे पे अजब सा तनाव छह
पैसे तो भेज देते हैं मिलने नहीं जाते,
मां बाप से बेटों के ये कैसा लगाव है।

मैंने 'तीरगी से लड़ता रहा ' को बहुत गहराई से पढ़ा है, ज़िंदगी के तमाम पहलुओं को इस किताब में ग़ज़लकार ने उजागर किया है । अध्ययन और सोच हर कवि और शाइर की अलग अलग होती है, फ़र्क़ ये है कि इन्हें कौन किस दृष्टि कोण से देखता है। ये ज़ाबिया-ए-निगाह मुहतरम डॉ राम गोपाल भारतीय जी की ख़ूबी है जो उन्हें दौर-ए-हाज़िर के अन्य कवियों से अलग पहचान दिलाती है । यक़ीन है कि इस मजमूए में शामिल गहराई से महसूस की जाने वाली ग़ज़लें पाठकों के दिल तक पहुँचेंगी । मेरी दुआ है कि ये किताब आसमान-ए-अदब की बुलंदियों तक पहुँचे ।


रचयिता: डॉ रामगोपाल भारतीय
पंख प्रकाशन, मेरठ
मूल्य 100 रुपये मात्र  (पृष्ठ 80)