चिलचिलाती तेज धूप मैं गर्म हवाएं चल रही थी ऐसे खतरनाक मौसम में अर्धनग्न अपने डागले के नीचे बैठा कालूबा बीड़ी पी रहा था सिर के आधे बाल सफेद, शेष सिर सपाट था। आंखें धसी धसी और हाथ पैर किसी लकड़ी की तरह सूखे पतले से।

हेस्टिंग्स आए हुए मुझे बहुत वर्ष होने को है। यह लंदन से थोड़ा दूर एक बेहद साफ सुथरा गाँव है। मेरा यहाँ आना कैसे हुआ, मुझे भारत क्यों छोड़ना पड़ा, एक मार्मिक घटना है।

....बात जंगल के राजा की थी लिहाजा फैसला हो गया। जंगली झाड़ियों को जलाने के लिए जंगल में आग लगाई जाएगी ताकि जंगल साफ सुथरा दिखे और जंगली जानवर उनमें उलझकर घायल न हों..

‘तुम फिर आ गईं अम्मा?’- डाकखाने के बड़े बाबू ने उस बुढ़िया को दुत्कारते हुए कहा जिसके बदन पर एक सफ़ेद मामूली-सी धोती थी।

बाहर से लौट कर गेट खोला, तो भीतर कुछ पत्र पड़े। दो लिफाफे और बाकी पोस्ट कार्ड थे। पत्र जब चलन से बाहर हो चले हों, ऐसे समय में इन पत्रों का आना, मेरे लिये किसी नेमत से कम नहीं था। उन्हें उठाकर टेबल पर रखने लगी तो, एक पोस्टकार्ड ने मेरा ध्यान खींचा।

नए मकान के सामने पक्की चहारदीवारी खड़ी करके जो आहाता बनाया गया है, उसमें दोनो ओर पलाश के पेड़ों पर लाला लाल फूल छा गए थे।

रचना प्रेषित करें

"आखर-आखर" पत्रिका में प्रकाशन हेतु आपकी साहित्यिक लेख, कविता, कहानी, लघुकथा, व्यंग्य, समीक्षा, संस्मरण आदि रचनाएं आमंत्रित है।

प्रकाशन हेतु लेखक अपनी रचना "[email protected]" पर ईमेल कर सकते हैं।

पुस्तक समीक्षा प्रकाशन हेतु पुस्तक की एक प्रति डाक द्वारा निम्न पते पर अवश्य भेजें :

डॉ पुष्पलता अधिवक्ता मुजफ्फरनगर
253-ए, साउथ सिविल लाइन,
मुजफ्फरनगर-251001 (उ.प्र.)

सम्पादक मंडल

मुख्य सम्पादक : डॉ. पुष्पलता मुजफ्फरनगर

सह सम्पादक : मिली सिंहराहुल सिंह

प्रबंध सम्पादक : राजेश मंगल

Go to top

 © सर्वाधिकार सुरक्षित आखर-आखर (हिन्दी वेब पत्रिका) || Powered by Aakar Associates Pvt Ltd