"मैडम, मुझे भी एनुअल डे के कल्चरल प्रोग्राम में पार्टिसिपेट करना है l प्लीज़, मुझे भी ग्रुप डाँस में ले लीजिये l" 12 वर्ष की सातवी में पढ़ने वाली कुषा ने झिझकते हुए अपनी म्युज़िक टीचर से कहाl

"अब तो डाँस ग्रुप कम्प्लीट हो गया, अब अगले साल आना, ओके l "

"तो फ़िर मुझे आॅर्केस्ट्रा ग्रुप में ले लीजिये l"

" क्या बजाओगी ?"

"मैडम, जो भी आप बताओगे, जो भी सिखाओगे l " आँखों में चमक आ गयी कुषा की l

"तुम्हारे घर पे तानपुरा है,, या हारमोनियम ?"

"नहीं, मैडम, वो तो नहीं है l " मायूसी ने अभी अभी आयी चमक पर डाका डाल दिया l

"अरे, तो प्रैक्टिस कैसे करोगी, तुम , क्योंकि ज़्यादा दिन नहीं बचे हैं, हमारे पास, और घर पर प्रैक्टिस के बिना कैसे होगा ?"

"मैडम, मैं पापा से बोलूँगी, तो वो दिला देंगे, तो फिर मैं घर पर प्रैक्टिस कर लूँगी l " पूरे विश्वास के साथ बोली कुषा l

"अच्छा, तो ठीक है, जब हारमोनियम आ जाये घर पर तब आ जाना l "

"ठीक है मैडम l आज सैटर्डे है l कल सन्डे को मेरे पापा हारमोनियम ले आयेंगे, तब मन्डे से मैं भी आर्केस्ट्रा ग्रुप में प्ले करूँगी,, है न? "

"हाँ "

आश्वासन मिलते ही कुषा, इंतज़ार करने लगती है, बेसब्री से, स्कूल की छुट्टी की घण्टी बजने का l

आज तो जैसे वह चल नहीं रही थी,, उड़ रही थी,,,l सोचती जा रही थी कि कब जल्दी से जल्दी घर पहुँचे,, कब शाम हो, कब पापा आयें और कब वो उनसे कहे कि उसे एनुअल डे में पार्टिसिपेट करना है, जिसके लिये हारमोनियम होना चाहिए घर पर l

मगर ये घण्टे भी आज कितनी मुश्किल से सरक रहे थे l कुषा का मन छटपटा रहा था,, खेल में भी मन नहीं लग रहा था उसका l

पापा के आते ही, रोज़ की तरह सबसे पहले दौड़ कर हाथ का सुटकेस और फ़्रूट का लिफ़ाफ़ा लिया ,,दौड़ कर पानी का गिलास दिया,, कि पानी पियें, हाथ-मुँह धोकर फ़्रेश हो लें , तो अपने पेट में पड़ी बात कहे l

पाँच भाई-बहनों में चौथे नम्बर की कुषा जानती थी कि, पिता ने अपने बच्चों को हर वो चीज़ दिलाई, जिसके लिये उनके बच्चों ने कहा कि ज़रूरी है,, स्कूल के लिये l

भले ही पिता के ऊपर न सिर्फ़ अपने पाँच बच्चों ,बल्कि अपने भाई-बहनों व वृद्ध होते पिता की भी ज़िम्मेदारियाँ थी l खर्चे तो बड़े थे,, मगर कुषा के पिता ने कभी अपने बच्चों को किसी बात के लिये मना नहीं किया l भले ही उन्होंने एक एक पैसा जोड़-जोड़ कर ज़मीन ख़रीदी l फिर, धीरे-धीरे , पहले एक कमरा, फिर दूसरा,, केवल ईंट की चिनाई करवा कर, लैन्टर डालकर, बिना फ़र्श-प्लास्टर ,यहाँ तक कि बिना खिड़की दरवाज़े लगे घर में रहना शुरू कर दिया था, ताकि किराये के पैसे न देने पड़ें ,और घर के खर्चे पूरे किये जा सकें l अब तो घर में प्लास्टर, फ़र्श और खिड़की दरवाज़े भी लग चुके थे l

बड़े भइया काॅलेज में पढ़ रहे थे,, और एक भाई, और उसकी दोनों बहने अभी स्कूल में थे,, पर सब अलग-अलग स्कूल में पढ़ रहे कुछ पहले ही बुआ की शादी भी हो गयी थी l
कुषा की उद्विग्नता पिता से कहाँ छुपती,, सो पानी पीते-पीते, मुस्कुराते हुए पूछ लिया l

"क्या बात है? तुझे कुछ कहना है ?"

'ये क्या,, पापा को कैसे पता चल जाता है'l

"न , हहाँ ,न न,, आप पहले पानी पीजिये,, पापा,," लगभग मुँह से बाहर निकलती बात को बड़ी मुश्किल से रोका l

"अच्छा ,,चल ठीक है,,, होमवर्क कर लिया?"

"हाँजी, पापा"

सिर हिलाते हुए, पापा कपड़े बदलने चले गये l बस,, अब थोड़ा सा सब्र और,,, फिर कुषा का उतावलापन खत्म l

पापा के फ़्रेश होकर लौटते ही कुषा ने मैडम से हुई सारी बात पापा को बताई l

"पापा, अगर हारमोनियम नहीं हुआ तो मुझे मैडम फ़ंक्शन में नहीं लेंगी ! "

"पर, बेटा, हारमोनियम कोई दो-चार, दस-बीस रुपये का थोड़ी न आता है l कई सौ रुपये का आयेगा l अभी, महीना भी खत्म होने वाला है,, पैसे खत्म हो चले हैं l अगली बार ले लेना भाग "

"पता नहीं, अगली बार मैडम लें, या नहीं,,,

पापा,, " दौड़ कर कुषा अपनी गुल्लक उठा लायी l आप मेरी गुल्लक के पैसे ले लो"

"अरे, तेरी गुल्लक में कितने पैसे होंगे ?" हँसते हुए कुषा के पापा ने कहा l

"और कुछ नहीं तो, कम से कम तीन-चार सौ रुपये तो होंगे ही, और , आप न मुझे अगले महीने के पाॅकेट-मनी के भी पैसे मत देना l "

कहते हुए कुषा अपनी गुल्लक,, टीन वाले नारियल के तेल के डिब्बे के ऊपरी भाग को लगभग एक-डेढ़ इंच काटकर, बनाई गयी उस गुल्लक को हिला हिला कर उसमें भरे सिक्के गिराने लग जाती है l
और मुस्कुराहट लिए पापा के साथ-साथ भाई-बहन भीे सारा खेल देख रहे थे l

थोड़ी सी मेहनत के बाद गुल्लक खाली हो गयी और फिर शुरू हुआ सिक्के गिनने का काम l

कुषा का गुल्लक से निकाले पैसे गिनना शुरू....

कहानी आगे ...

कुछ एक-दो, पाँच और दस के नोट,, एक तरफ़ रख दिये गये,, नारियल तेल के डिब्बे से निकले सिक्के और नोट तेल के असर से अछूते कैसे रह पाते भला !!!

एक, दो, तीन.... दस , सिक्कों की ढेरी बना कर रख दी... फिर दूसरी ढेरी,, तीसरी,,, ढेरियों की बढ़ती संख्या के साथ-साथ कुषा का दिल भी अपनी चाल बढ़ाता जा रहा था l

...और जब ढेरियाँ गिनी तो,,,आह्हा,,,पूरी तीस ,,,यानि पूरे तीन सौ रुपये !!! और सारे नोट गिने, तो नब्बे रुपये,,, यानि चार सौ मैं बस दस कम,,, खुशी से कूदते हुए पिता को बताने दौड़ पड़ी,, जो कि तब तक चाय का कप लेकर बाहर अहाते में जाकर बैठ चुके थे, और ले जाकर रख दिये उनके हाथों में l

"पापा, ये तीन सौ नब्बे रुपये निकले हैं, मेरी गुल्लक से l लीजिये l"

अपने बच्चों के स्वाभिमान को ऊँचा बनाये रखने की दिशा में ये भी कुषा के पिता की टैक्नीक थी, ताकि बच्चों को पैसे का महत्व भी पता चले और बचत की महत्ता भी l साथ ही यह कि बच्चे को लगे कि उन्होंने भी अपना योगदान दिया है l पिता ने चुपचाप कुषा के दिये सिक्के रख लिये l

अगली शाम को जब पिता ऑफ़िस से लौटे तो साथ में था एक लकड़ी का बक्साl जिसमें वही था जिसका कुषा को इंतज़ार था l खुशी से उछल पड़ी कुषा l अब तो मैडम उसे एनुअल फ़ंक्शन में ज़रूर भाग लेने देंगी l

रात भर उसने सपने में खुद को स्कूल के प्रोग्राम में हारमोनिया बजाते हुए देखा l

सुबह को एक नए उल्लास और आत्मविश्वास के साथ स्कूल की ओर रवाना हो गयी कुषा l प्रैक्टिस पीरियड के लगते ही वह दौड़ कर म्युज़िक मैडम के पास पहुँच गयी l

"मैडम, मेरे पापा ने मुझे हारमोनियम ला कर दे दिया है l अब मुझे भी ग्रुप में शामिल कर लीजिये l"

"क्या !?? पापा ने ला दिया !!"

"येस, मैडम l" कुषा ने फ़ख्र से कहा l

"अरे, नीता जी,, देखो तो इसे,,, मैंने तो इसे ऐसे ही कह दिया, और ये तो सचमुच खरीदवा ली l" कहते-कहते मैडम दूसरी सहायिका के साथ हँस पड़ी l प्रैक्टिस करते ग्रुप के बच्चों में से कुछ मुस्कुरा रहे थे, और कुछ कुषा के लिए बुरा महसूस कर रहे थेl

और कुषा .....

उसे तो समझ ही नहीं आ रहा था कि टीचर उस पर क्यों हँस रही हैं। कि क्या अब भी उसे स्कूल के ऐनुअल फंक्शन के कार्यक्रम में शामिल किया जाएगा या नहीं!

और अगर नहीं किया गया तो वह घर जाकर क्या कहेगी!

वह उसी जगह खड़ी हुई थी कि शायद अभी उसकी मैडम उसे कुछ कहेंगी।

परंतु कोई उत्तर न पाकर वह भारी मन और भारी कदम लेकर क्लास रूम में वापस लौटी और धीरे से अपना स्कूल का बैग अपने दोनों कन्धों पर टाँगा और घर की ओर चल पड़ी। स्कूल की छुट्टी तो कब की हो चुकी थी।