चिलचिलाती तेज धूप मैं गर्म हवाएं चल रही थी ऐसे खतरनाक मौसम में अर्धनग्न अपने डागले के नीचे बैठा कालूबा बीड़ी पी रहा था सिर के आधे बाल सफेद, शेष सिर सपाट था। आंखें धसी धसी और हाथ पैर किसी लकड़ी की तरह सूखे पतले से।

पास ही एक मटकी रखी थी, जिसमें मुश्किल से एक दो लोटा पानी था। दूर-दूर तक सुनसान ऊंची ऊंची पहाड़ियां के अतिरिक्त कुछ था तो सिर्फ इन्हीं गिनी दो चार झोपड़ियां और कुछ चुपचाप खड़े महुआ के पेड़। डागले के समीप ही कालू बा का छोटा सा खेत था जो गरम गरम लपटों मैं झुलस रहा था। सूखा खेत रेगिस्तान बन गया था। पानी के अभाव में यह प्यासा खेत बड़ा भयानक दिखाई दे रहा था। इसी खेत में दो तीन महुआ के पेड़ थे। जिसके नीचे कालूबा का बेल बंधा था। अगर कुछ देर और बेल अपना काम नहीं हिलाता तो मैं यह समझता शायद भगवान शिव के नंदी की विशाल प्रतिमा रखी है।

मैं कालूबा के पीछे खड़ा था। उसका मुंह अपने घर की तरफ था। घर क्या कवेलू की छोटी सी झोपड़ी जो चार लकड़ी के खंभों पर टिकी थी। तभी एक कुत्तिया झोपड़ी के पीछे से निकल मुझे देख भोकने लगी। उसके भोंकने से कालूबा को किसी की उपस्थिति का एहसास हुआ। उसने पीछे मुड़कर देखा। राम-राम बाबूजी बोलता हुआ वह खटिया से उठ बैठा। मुझे खटिया पर बैठाकर वह खटिया के समीप बैठ गया और अपनी बीड़ी को जमीन से रगड़ते हुए मुझे देखने लगा। उसके देखने में ऐसा लग रहा था मानव वह पूछ रहा हो क्यों आए? क्या काम है? आया तो काम से ही था- सरकार के भर्ती अभियान में बच्चों की संख्या बढ़ाने के लिए टापरे टापरे सर्वे कर रहा था। मुझे यहां एक भी बच्चा नहीं दिखाई दिया। यही वजह थी कि मैं अपना काम तो भूल गया और कालूबा से उसकी जिंदगी के संदर्भ में सवाल करने बैठ गया। सवाल खत्म होते ही मैं उठ गया और बिना कुछ बोले बताएं कि मैं कौन था? क्यों आया था? मैं वहां से चल दिया।

रास्ते भर कालूबा का खामोश खेत और महुआ के पेड़ याद आते रहे। महुआ के तीनों पेड़ कालू बाकी जिंदगी थे। इन पेड़ों पर लगे महुओ को बेचकर ही वह अपना गुजारा कर रहे।

एक लड़की थी झेला, जवान और बेहद खूबसूरत। एक दिन बाद ही कालूबा के साथ बाजार में महुआ बेचने गई और उसी दिन कालूबा की आंखों में धूल झोंक कर वह किसी मर्द के साथ भाग गई, फिर कभी वापस नहीं आई। पत्नी तो झेला को जन्म देते ही ईश्वर को प्यारी हो गई थी। अगर कुछ था तो तीन पेड़, उजाड़ सा खामोश खेत जो स्वयं प्यासा था वह कालूबा की प्यास कैसे बुझाता? इस वक्त तो महुआ के पेड़ कालू बाकी जिंदगी थे, सहारा थे। पूरे रास्ते मैं कालू बा के बारे में सोचता रहा घर कब आ गया पता ही नहीं चला। 

न जाने क्यों कालूबा की साहसी जिंदगी से मुझे बेहद प्यार हो गया था। यही वजह थी की आठ-दस दिन बाद कालूबा से मिलने फिर गया पर कलूबा नहीं मिले। पता चला कि उनकी बेटी झेला आई थी कालूबा उसी के साथ कुछ दिनों के लिए चले गए थे, जब वापस लौटा तो बहुत हैरान है महुआ के तीनों हरे पेड़ कटे हुए थे। बचे थे तो सिर्फ ठूंठ जिसे देखकर वह बच्चों की तरह ठूंठों से लिपट कर रोने लगे। कालूबा को किसी गाँव वाले ने चुपचाप बताया कि तेरा भाई वेलू के घर गया। वेलू, कालुबा को देख जोर -जोर से हंसने लगा और बोला - ' तु मुझे एक महुआ दे देता तो क्या जाता? कालुबा, वेलू  के सामने बहुत रोया  फिर वेलू को सरकार के पास चलने के लिए कहा, अपराध के बोध से ग्रस्त वेलू कालूबा की बातों से भयभीत हो गया। कालू आगे-आगे जा रहा था। वेलू  चुपचाप कुल्हाड़ी को छिपाए उसके पीछे चलने लगा। मौका देखते ही वेलू ने कालूबा पर कुल्हाड़ी से दो-तीन संघातिक वार कर दिए। कालूबा लड़खड़ाते हुए से भागने लगे और महुआ के उन्हीं  ठूंठों के पास जाकर गिर पड़े।

जिस कुल्हाड़ी से वेलु ने महुआ के हरे पेड़ों को काटा था उसी कुल्हाड़ी से आज वेलु ने कालूबा को भी काट दिया।