डमरू ने कागज में लिपटा एक पैकेट नुमा सामान मेरी ओर बढ़ाया और याचक मुद्रा में देखने लगा।

मुझे समझ नहीं आ रहा था कि वह मुझसे क्या चाहता है।

मैंने कागज के लपेट को खोलना शुरू किया, तो डमरू बीच में ही बोला, ‘माँझी थोड़ा देखकर, टूट न जाये'।

मैंने बीच में ही हाथ रोक लिया। उससे पूछा, तू ही बता दे, ऐसा क्या है इसमें। तू मुझे देना भी चाहता है, खोलने भी नहीं दे रहा'।

डमरू ने कहा, ‘मंाझी इसमें आपके लिए कांच की चूड़ियां हैं। मैंने अपने हाथ से बनाई हैं। आप इसे जरूर पहनना। उसने कांच की चूड़ियां मेरे हाथ में रख दी’।

मैंने आश्चर्य से पूछा ‘तूने! इतना बित्तेभर का तू। क्या जाने चूड़ी बनाना’।

डमरू ने पूरे आत्मविश्वास से कहा, ‘मैं भी बनाता हूं और लल्लन मेरा छोटू भी बनाता है। मैं फैक्ट्री जाता हूं। मां और लल्लन घर पर जुड़ाई का काम करते हैं। यह जोड़ा मैंने अपने हाथ से जोड़ा है और मीना भी मैंने ही लगाया है’।

मैं डमरू की बात पर विश्वास ही नही कर पा रही थी। वह डमरू जिसे अभी अपने नाक पोंछने का सहूर नही था, वह इतनी सुन्दर जड़ाऊ चूड़ी बना लेता है!

मैंने उस से कड़ाई से पूछा, ‘सच-सच बता कहां से लाया है, पैसे कहां से लिये कहीं चोरी वोरी तो नहीं की।’

डमरू के साथ आया उसका छोटू भाई बोला, ‘नहीं मंाझी, यह चूड़ी डमरू भैया ने ही बनाई है। इसने एक नहीं बहुत सी चूड़ियां बनाई हैं। वो सभी चूड़ियां ठेकेदार कल ही ठेले पर ले गया। डमरू भैया झूठ नहीं बोल रहे। हम सभी चूड़ी बनाने का काम करते हैं’।

मैंने लल्लन और डमरू को ऊपर से नीचे तक देखा, दोनों की उम्र सात से नौ वर्ष की ही होगी। पेट की भूख, उनकी धंसी हुई आंखों में साफ झलक रही थी। डमरू के पैरों में चप्पल थी, लल्लन नंगे पैर था। मुझे एकदम ख्याल आया कि मेरे टिफिन में खाना बचा हुआ है, क्योंकि आज दफ्तर में पार्टी दी गई थी। मैंने डमरू को अपना खाना दे दिया। चार रोटी, चावल और दाल-सब्जी देख डमरू की आंखों में आई चमक उसकी भूख दर्शा रही थी, लेकिन उसके हाथ कपकंपा रहे थे कि कैसे वह भोजन को स्वीकारे। मैंने बहुत जोर देकर कहा था, ले जा घर जाकर खा लेना।

लल्लन, डमरू की ओर देख रहा था कि कब वह खाने के पैकेट उठाये। लेकिन डमरू बार-बार एक ही बात कह रहा था, ‘छेदीलाल की तलाश की चिट्ठी पर क्या कार्रवाई हुई। छेदीलाल कब मिलेंगे’? वह चाहता था कि उसे पता चले कि छेदीलाल लापता मजदूर की क्या रिपोर्ट आई है। क्या छेदीलाल मिल गया? क्या छेदी लाल जिन्दा है? क्या छेदीलाल मिल जायेगा? उसके चेहरे पर प्रश्न वाचक हाव-भाव मैं आसानी से पढ़ रही थी, लेकिन निरुत्तर थी क्योंकि लापता मजदूरों की तफतीश अभी तक पूरी नहीं हुई थी। न तो छेदीलाल के मरने की कोई पुख्ता जानकारी थी न ही जीवित होने का कोई सुराग।

मैंने डमरू को आश्वस्त किया, ‘तू घर जा, मुझे तेरा घर पता है, मैं तुझे घर से बुलवा लूंगी’।

डमरू बार-बार आग्रह कर रहा था, ‘मांझी आप यह चूड़ी देखें कैसी है? मैंने फैक्ट्री में जाना शुरू कर दिया। यह पहली चूड़ी का तोड़ा था, जिसमें से आपके लिए यह जोड़ा लाया हूं। लल्लन ने इसकी जुड़ाई और मैंने जड़ाई का काम किया है। नई डिब्बी लाने के पैसे न थे इसलिए कागज में लपेटकर लाया हूं। कल ठेकेदार से डिब्बी ला दूंगा। बिल्कुल असल लगेगी जैसी हाट में मिलती है’।

मैं डमरू के उत्साह को देखकर प्रसन्न हो रही थी। आठ वर्ष के बच्चे ने कितनी मेहनत की है और कैसे ऋणमुक्त होने का यह नायाब तरीका सोचा है। यदि मैं उसे कल खाना नहीं देती तो क्या फिर भी यह चूड़ियां लेकर आता। मैं बहुत देर तक विचार मग्न रही। कभी चूड़ियों के जोड़े को देखती, तो कभी डमरू की कातर निगाहों को, जो मेरे टिफिन बाॅक्स से निकले भोजन की ओर लालायित नजरों से देख रहा था। पेट का ताप शायद उस बासी बची रोटी ने शांत कर दिया होगा। लेकिन इतने छोटे बच्चे के मन में मेरे प्रति इतना आदर भाव कि आज पहले दिन फैक्ट्री गया, पहला तोड़ा तैयार किया और उसमें से पहला जोड़ा मेरे लिए लेकर आया। मैं भावुक हो गई। क्या उसके मन में मेरे प्रति आदर भाव है! क्या वह मुझसे मिले बचे-खुचे भोजन से ऋण मुक्त होना चाहता है या जिस तरह वह मुझे मंाझी कह रहा है, क्या मुझमें अपनी मां का अक्स देख रहा है।

मैं भावुक हो उठी। पर्स उठाया और गाड़ी में बैठ गई। ड्राइवर ने गाड़ी बंगले पर आकर ही रोकी। अभी चाय पीकर लेटी ही थी कि झपकी आ गई। बाहर से बहुत तेज-तेज कुंडी खड़कने की आवाज आ रही थी, मैंने देखा दरवाजे पर डमरू और लल्लन दोनों खड़े थे। मैंने दोनों से पूछा, ‘इस समय यहां क्या कर रहे हो? लल्लन बोला मंाझी हम तो डेढ़ घंटे से खड़े हैं’।

‘फिर घंटी क्यों नहीं बजाई’।

‘घंटी तक हाथ नहीं जा रहा था’।

‘फिर कुंडी पहले क्यों नहीं बजाई’।

डमरू भैया ने मना किया था, ‘कह रहे थे मंाझी अभी थककर आई हैं, थोड़ा सुस्ता लें तभी खटका करेंगे। लेकिन अब रात होने लगी थी। गांव का रास्ता भूल जाते इसलिए कुंडी खटका दी’।

मेरे मन में डमरू के लिए और ममता के भाव उमड़ने लगे। एक नन्हा सा बच्चा जिस ने बचपन, तो जैसे जिया ही नहीं, कैसे बड़ों जैसी बातें करता है। मैने दोनों को अन्दर बुलाया। एक-एक केला और बिस्कुट दिए। दोनों ने केला और बिस्कुट हाथांे में थाम लिए और चुपचाप खड़े रहे। मैंने डपट कर कहा, ‘खाते क्यों नहीं ये तुम्हारे लिए ही तो हैं’।

डमरू बोला घर जाकर खा लेंगे, लेकिन लल्लन ने उसकी पोल खोल दी। बोला, ‘मंाझी यह केला, बिस्किट डमरू भैया ने मां के लिए रखा है। हमने तो अभी कल ही खाना खाया था। यह केला मां के लिए ले जाएंगे’।

मेरा मन डमरू के लिए पसीजने लगा, कैसी विडम्बना है? जिस उम्र के बच्चे को मां हाथ से कौर खिलाती है, उस उम्र का बच्चा मां के निवाले की चिन्ता कर रहा है। कैसा गांव है, जहां लोग दो-दो दिन भूखे रहने को मजबूर हैं और सात-आठ बरस का छोटा सा लड़का मां के लिए इतना समर्पित।

मैंने लल्लन से कहा, जा उस टेबल से सारे केले उठा ला और घर जा कर सभी खा लेना। मां को भी देना और तू भी खा लेना।

लल्लन जैसे ही मेज की ओर बढ़ा, डमरू ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोला ‘मंाझी! हमें तो भूखे रहने की आदत है, लेकिन बापू के न मिलने से हमारी मां मर जायेगी। आप मेरे बापू की फाइल को देख लो और जो भी सच हो हमें बता दो’।

मैंने डमरू को कहा... ‘तू मेरे पास कल दिन में अकेले आना लल्लन को घर पर छोड़ कर आना’।

डमरू बोला, ‘मंाझी मैं दिन में न आ सकूंगा। नया-नया काम लगा है। ठेकेदार फैक्ट्री से बाहर निकाल देगा। मैं इसी समय आ सकूंगा या दिन में लल्लन को भेज दूँ'।

‘क्या! तू फैक्ट्री में काम करने लगा है’।

‘हां माझी, मैं ग्लास फैक्ट्री में काम करता हूं’।

‘लेकिन, वहां तो सभी फरनस फैक्ट्री हैं, वहां तू क्या करता है भला।

‘हां मांझी मैं, अरोड़ा फरनस फैक्ट्री में काम करता हूं। वहां कांच गलाया जाता है और चूड़ियों से लेकर झूमर तक सभी बनते हैं’।

‘लेकिन तू वहां क्या करता है’?

‘मैं पहले बापू की जगह हाजिरी रजिस्टर में अंगूठा लगाता हूं और फैक्ट्री के भीतर जाकर कांच से भरी टेª को भट्ठियों की ओर सरकाता हूं। मैं छोटा हूं न इसलिए ठेकेदार चाचा ने भारी वजन वाला काम नहीं दिया। वे मेरे पिता जी को जानते हैं। कहते हंै, तू छेदी का लड़का है। बाप का काम बेटा कर सकता है। तेरे बापू को तो भारी काम करना पड़ता था। तुझे तो भट्ठी के पास खड़ा होकर माल आगे पीछे करना पड़ता है’।

‘वहां तो बहुत गर्मी लगती होगी’।

‘हां जी, ज्यादा गर्मी लगती है। इसलिए कमीज उतार कर काम करता हूं’।

मैं डमरू के बालरूप और युवा मन को सुनकर सिहर उठी। हे भगवान! बेशर्म ठेकेदार, लापता मजदूर को ढूंढने की बजाय, उसके मासूम बच्चे को भट्ठी मंे झोक रहा है।

मैंने डमरू और लल्लन को उनके घर भेज दिया और कहा, ‘कल कोई भी मत आना, मैं अपने आप देख लूंगी और जरूरत पड़ी तो तुम्हें बुलवा लूंगी’।

डमरू, लल्लन वापस गांव में आ गये। मां के हाथ में पांच केले दिए। मां ने दो-दो दोनों भाइयो को दिए और एक खुद खाकर पानी पिया और बोरी पर पसर गई। मां ने लेटे-लेटे डमरू से कहा, ‘उस माई को दो-चार चूड़ी के जोड़े और दे आना और बापू का पूछना क्या हुआ। ठेकेदार कह रहा था कि कलैक्टर के दफ्तर में बिना कुछ लिए दिये काम नहीं होता। तेरे बापू का पता चल जायेगा तो ठेकेदार से पिछला हिसाब किताब कर लेंगे और जो तू नये जोड़े मेम साहब के लिए लायेगा उसके पैसे भी कटवा लेना’।

लल्लन ने मां से पूछा, ‘माई लेना-देना क्या होता है, मंाझी ने तो हमारे लिए खाना भी दिया था और आज इतने सारे केले भी दिए हैं, वो तो बहुत अच्छे हैं’।

‘अरे! तू सो जा। कोई अच्छा नाही है। अच्छा होते तो तेरे बापू की खोज काहे न होती। रोज रोज ठेकेदार बाबू कलैक्टर दफ्तर जाते हैं, अभी तक काहे नहीं कुछ पता चला’।

डमरू ने मां की बात को काटा और कहा, ‘अच्छा कल तू भी हमारे साथ मंाझी के कमरे पर चलना। तू पूछ लेना बापू के बारे में। फिर तुझे पता चलेगा मंाझी कैसी हंै’। मां ने कहा ‘ठीक है’, तीनों एक दूसरे के आसरे बोरी पर पसर गये।

तड़के आठ बजे डमरू फैक्ट्री के गेट पर पहुंच गया और लल्लन ठेकेदार के अड्डे पर। जहां से जुड़ाई का काम लाता था। मां-बेटा दिनभर मिट्टी तेल की डिबिया जला कर चूड़ी जुड़ाई करते थे। रात को डमरू उसमें जड़ाई का काम करता था। लल्लन और उसकी मां को तीन सौ पन्द्रह चूड़ी जोड़ने पर आठ रूपये पचास पैसे ठेकेदार की किताब में जुड़ जाते थे और डमरू को छेदीलाल की फैक्ट्री में गैर हाजिर होने के कारण हाजिरी देनी पड़ती थी। जिसके कारण उसे रात भर जागकर जड़ाऊ का काम करना पड़ता था।

शाम साढ़े सात बजे बंगले की काॅलबैल बजी। मैंने दरवाजा खोला। मैली-कुचैली धोती में लिपटी तेइस-चैबीस वर्ष की एक महिला लल्लन और डमरू के साथ दरवाजे पर खड़ी थी। उसके हाथ में दो डिब्बियां थीं। उसने उसे मेरी ओर बढ़ाया और कहा, ‘हमरे पति को ढूंढ़ दो जी। हम आपको और भी तोड़े ला देंगे। अभी हमरे पास दो ही थे। देखो तीन रूपये की डिब्बी भी आपके लिए खरीदने के लिए इस बिटवा ने रात को नौ बजे तक ठेकेदार बाबू की चिरोरी की थी। वो तो कह रहे थे कुछ अच्छा सा सामान लेकर जाना पर हमरे पास तो कुछउ अच्छा नाही है। ई तोड़ा ही ला पाये रहेन। जब इका बापू मिल जाई, आप का उपहार जरूर जरूर ले आएंगे। हम पर दया कीजिए हमरे पति की सुध लीजिए। हम आपकी गुलामी करेंगे। आपके बरतन कपड़ा सभी धो देंगे। एक हंू पैसा नहीं चाहे। बस हमार पति की सुध ले लो’।

मैं, अवाक खड़ी रह गई। गुस्से से भौंहे तन रही थी। मानो किसी ने तेजाब की बोतल मेरे ऊपर उडे़ल दी हो। यह लोग जो अपना पेट भी नहीं भर पाते, बच्चे भूखे सोते हैं। वह मुझे रिश्वत की पेशकश कर रहे हैं। वह भी यह पांच-पांच रूपये की चूड़ी की डिब्बी के रूप में।

मैं डमरू के प्रति जितनी ममतामयी हो रही थी कि वह मुझमें अपनी मां का अक्स देख रहा है या मुझमें आदर भाव रख रहा है। मुझे क्या मालूम था वह मुझे रिश्वत की पहली खेप के रूप में कागज में लिपटा वह चूड़ियों का जोड़ा दे गया था। मैंने डमरू के स्नेह में भावपूर्ण होकर वह चूड़ियां अपनी कलाइयों में सजा ली थी। उस कांच की चूड़ी की जगह मुझे अपनी सोने की हीरे जड़ी चूड़ियां फीकी लग रही थी, लेकिन छेदी की पत्नी की बात सुन वह चूड़ियां मुझे सांप की लपेट की तरह व्याकुल करने लगी। मैं भीतर गई साबुन लगाकर चूड़ियां उतार दी और वहीं डाइनिंग टेबल पर पटक दी और पर्स में पड़ी सोने की चूड़ियां पहन कर वापिस बाहर आई। अपने गुस्से पर काबू नहीं कर पा रही थी, लेकिन वह महिला याचक मुद्रा में मेरे समक्ष खड़ी थी। बार-बार गुहार कर रही थी। मेमसाब हमरी मदद करो। मुझे कभी डमरू और लल्लन के मासूम चेहरे दिख रहे थे, कभी मैं उस महिला को देख रही थी, जिसकी पति वियोग में आंखें गालों में ध्ंासी जा रही थी।

मैंने तीनों को बैठाया और पूछा कि तुम्हारा गुजारा कैसे चल रहा है। छेदी को लापता हुए कितना टाइम हो चुका है। यह छोटे बच्चे स्कूल क्यों नहीं जाते।

कमली, छेदी की पत्नी ने कहा ‘मेमसाब! गुजारा बहुत कठिन हो गया। डमरू के बापू शाम को चैदह-पंद्रह रूपये लाते थे। मैं और दोनों बच्चे शाम तक ठेकेदार का पन्द्रह रूपये का काम कर लेते थे। मिट्टी के तेल का खर्च कटवा कर तेरह रूपये मिल जाते हैं, खाना भर हो जाता है। स्कूल तो भेज नहीं सकते। वर्दी और खर्च नहीं हो पाता। बच्चे हमारे साथ चूड़ी का काम ही करते हैं’।

अच्छा, कमली बताओ, ‘अब डमरू फैक्ट्री जा रहा है, क्या वह शाम को पन्द्रह-सोलह रूपये नहीं ला रहा’।

‘नहीं मेम साहब। ठेकेदार बाबू कहता है डमरू काम नहीं करेगा तो उसके बापू का नाम कट जायेगा। इसलिए डमरू काम पर जा रहा है। डमरू को कुछ नहीं मिलता’।

मेरा माथा ठनकने लगा था। ठेकेदार की बदमाशी इस पूरे प्रकरण में मुझे साफ दिख रही थी। गरीब परिवारों का किस तरह खून चूस रहा है। यह साफ दिख रहा है। मैंने कमली से पूछा, ‘तुम्हारे जैसे और कितने लोग हैं इस गांव मेे जिनको यह ठेकेदार काम देता है’।

कमली ने हाथ पर गिनने की कोशिश की लेकिन गिन न सकी। बोली, ‘मेमसाहब! पूरा गांव ही बाबूजी की वजह से रोटी खा रहा है। किशन बाबू हमारे अन्नदाता हैं’।

अच्छा, ‘यह बताओ छेदीलाल कब से घर नहीं आया’

‘कार्तिक की ग्यारस थी। तब से वह घर नहीं आये। लेकिन अब तो एक महीना बीत गया है’। ‘छेदीलाल को ढूंढने की अर्जी पहले क्यों नहीं दी थी’?

‘जी, ठेकेदार बाबू फैक्ट्री में ही ढूंढ रहे थे और हर माह दो सौ रूपया पगार के नाम पर भी दे रहे थे। अब पूस का महीना लग गया लेकिन डमरू के बापू का कुछ पता नहीं चल रहा’।

‘किशन बाबू कह रहे हैं कि स्कूल की बहनजी से चिट्ठी लिखवा कर कलैक्टर दफ्तर जाओ। चिट्ठी आपके पास भेजी थी, आपने भी कुछ नहीं किया’।

अब मेरे मन में ठेकेदार की धूर्तता की पूरी तस्वीर उभरने लगी थी। हो न हो छेदीलाल किसी हादसे का शिकार हो गया होगा और उसने उसके परिवार वालों से यह बात छुपाई होगी। गांव वालों को छेदीलाल के हादसे का भेद पता न चल जाये, इसलिए पगार रूप में दो सौ रूपये कमली को दे रहा था और कमली को मजबूर कर रहा था कि फैक्ट्री में काम करने की हामी भरे।

कमली के गर्भ में एक और जीव पल रहा था जिसके बारे में छेदीलाल और कमली ही जानते थे। उसने काम पर जाने से मना कर दिया, इसलिए किशन ने पैसा देना बंद कर दिया।

‘लेकिन कमली तूने डमरू को क्यों आग में झोंक दिया। तुझे पता है कितने बोल्ट का करंट होता वहां। कुछ ऐसा वैसा हो गया तो...’!

‘मेम साहब, मुझे क्या पता। बाबूजी बोले तो हमें भेजना पड़ गया। डमरू के बापू का नाम फैक्ट्री के रजिस्टर पर चढ़ा रहे, यही लिये हमने डमरू को जाने को कह दिया’।

अब मेरे सामने पूरी तस्वीर साफ हो गई थी। किशन ठेकेदार ने क्यों मेरे घर रिश्वत रूप में कुछ देने के लिए भेजा था। कैसे कमली कह रही थी कि छेदीलाल को पन्द्रह रूपये दिहाड़ी मिलती थी। क्यों डमरू का रजिस्टर पर अंगूठा लगाना जरूरी हो गया था?

मैंने तीनों को बिठाये रखा। रामू काका को तीनों के भोजन का प्रबन्ध करने को कहा और वर्मा जी, लेबर आयुक्ता को फोन किया। पूछा, ‘फरनस फैक्ट्री का चार्ज आपके आधीन है, जो अधिकारी इस काम पर तैनात है उसकी डिटेल लेकर कल दफ्तर में मिलो’।

पुनः मैंने कमली से पूछा, ‘तुम्हें कुछ लेने-देने की बात किसने कही थी। क्या उसने तुम्हें हमारा घर दिखाया था या किसी और के पास जाने को कहा था’।

‘हम नहीं जानते मेम साहब। किशन बाबू बोले थे कि छेदीलाल का पूस माह का पगार का दो सौ रूपया उन्होंने बड़े बाबू को दे दिया है। वही छेदीलाल के बारे में बता पायेंगे। हम सोचे गांव के बाहर आपका ही घर सबसे बड़ा है। आपके घर ही बड़े बाबू रहते होंगे, इसलिए हम आपके द्वार पर आ गये’।

छेदीलाल की गुमशुदगी और कमली की मासूमियत दोनों ने मेरा मन जैसे व्याकुल कर दिया हो।

आईएएस की परीक्षा पास करके पहली पोस्टिंग मुझे फिरोजाबाद गांव में मिली थी। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि मुझे इस दिन का सामना करना पड़ेगा जहां देश की सर्वोच्च सेवा सीट पर बैठकर मुझे एक ऐसे निरीह परिवार की ओर से, जो दो वक्त की रोटी भी नहीं जुटा पाता, अनजाने में पांच-पांच रूपये की सौगात रिश्वत रूप में मिलेगी। जी कर रहा था, फूट-फूट कर रो लंू। यह महिला मेरे ही आधीन प्रशासनिक अधिकारियों की अनदेखी की शिकार बनी है। कहीं न कहीं मै भी इसकी दोषी हूं। जिस प्रशासन को संवारने के लिए दिन-रात एक कर पढ़ाई पूरी की। आज मुझे अपनी वह सीट बहुत बौनी लग रही थी। वह परिवार जो मात्र दो सौ रूपये से पूरे महीने का राशन चलाता है, आज मैं उनकी अपराधिनी बन गई थी। मुझे वो पल याद आ रहे थे, जब मैंने भारतीय प्रशासनिक सेवा की नियुक्ति के समय देश के प्रति ईमानदारी और कर्तव्य के प्रतिनिष्ठा की शपथ खाई थी। वह शपथ मुझे झकझोर रही थी।

मैंने डमरू से भेंट जिस ममतामयी सुलभ हृदय से स्वीकार की थी वह मुझे रिश्वत स्वरूप मिली थी। जिस कमली के बच्चे मां के लिए केले बचा कर ले जाते हैं। उसी कमली ने बच्चों के मुंह का निवाला बचा कर मेरे लिए दो जोडे़ चूड़ी डिब्बी में सजा कर लाने के एवज में पूरे दिन की मजदूरी कटवा ली थी।

ओह! ईश्वर मेरे से यह कैसा पाप हो गया। मैं रात भर सो न सकी। मेरा मन हुआ कि मैं किशन ठेकेदार को पकड़कर लाऊं और उससे पूछूं कि दो सौ रूपये पगार किस तरह दी जा रही है या आठ बरस के बच्चे को फरनस फैक्ट्री में कैसे लगाया गया। मुझे पता नहीं मेरी कब आंख लग गई। आंख खुली तो सुबह के साढ़े नौ बज गये थे।

नहा-धोकर दफ्तर पहुंची। वर्माजी मेरा इंतजार कर रहे थे। उनके साथ उनके आधीन काम करने वाला एक अधिकारी था। जिसका परिचय अतुल कौशिक, ‘बड़े बाबू’ कहकर करवाया और बताया कि इस क्षेत्र की सभी फरनस फैक्ट्री का चार्ज अतुल कौशिक के पास है।

बड़े बाबू का नाम सुनते ही मैं आग बबूला हो गई और वर्माजी से कहा कि मुझे यह व्यक्ति किसी कीमत पर दिखाई नहीं देना चाहिए। यह मजदूरों का खून चूस रहा है।

वर्माजी ने मेरी बात पर अविश्वास सा दिखाया और कहा कि मैडम आपको कोई गलतफहमी तो नहीं। अतुल ऐसा लड़का नहीं है। यदि कोई भी बात ऐसी पाई गई, तो आप जो चाहे सजा दें, आपके आधीन है।

वर्माजी ने अतुल से अरोड़ा फरनस फैक्ट्री की डिटेल बताने के लिए कहा। जिसमें छेदीलाल के लापता होने का जिक्र प्रमुखता से था। अतुल ने बताया कि, ‘प्रति मजदूर एक सौ साठ रूपया प्रतिदिन दिहाड़ी दी जाती है’ और ठेकेदार प्रथा का उसमें कोई जिक्र ही नहीं था। छेदीलाल की गुमशुदगी से वह बिल्कुल अनभिज्ञ था।

मेरा गुस्सा आपे से बाहर होता जा रहा था। मैंने सख्ती से कहा यदि ठेकेदार का कोई लेना देना नहीं तो किशन ठेकेदार तुम्हारे को मजदूरों को पगार कैसे देता है। कैसे तुम निरीक्षण करते हो। जो तुम्हें यही नहीं मालूम कि फरनस फैक्ट्री में आठ-दस वर्ष की उम्र के बच्चे नौकरी कर रहे हैं।

अतुल को कतई यह अनुमान नहीं था कि मेरे पास छेदीलाल की गुमशुदगी की अर्जी और उसका पूरा परिवार, जिसने ंपूरे गांव की तकलीफ अपने सहज भाव में मुझे बताई थी।

सस्पेंशन के डर से अतुल ने सच उगलना शुरू किया और बताया कि छेदीलाल हाईबोल्टेज करंट की चपेट में आकर दिवंगत हो चुका है। यदि यह बात गांव वालों को पता चलती, तो कोई भी फैक्ट्री में काम करने को तैयार नहीं होता। इसलिए अरोड़ा फैक्ट्री मालिकों और ठेकेदार ने बीच का एक रास्ता अपनाया और किशन को प्रति माह पांच हजार रूपया छेदीलाल के परिवार को देने की बात पक्की की। पैसा पहुंचाने का जिम्मा भी किशन ठेकेदार को ही दिया गया, ताकि उसके दोनो ंबच्चे और बेवा गुजर-बसर कर सकें और मेरे पास यही सूचना है कि किशन ठेकेदार हर महीने पैसा दे रहा है। छेदीलाल की गुमशुदगी की बाबत मेरे पास ऐसी कोई एप्लीकेशन नहीं आई, जिस पर मैं कुछ कार्रवाई कर सकूं।

अब मुझे कुछ राहत मिली। मेरा प्रशासन किसी हद तक गलत नहीं था। कुछ गुमराह जरूर था। मैंने तुरन्त किशन ठेकेदार के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई और छेदीलाल की पत्नी को इस सच से अवगत कराया।

कमली की चीत्कार मेरे कानों में पिघले कांच की तरह पड़ रही थी कि मेम साहब मैंने आपको सुहाग की निशानी कांच की चूड़ियां भेंट की और आप ने मेरी ही कांच की चूड़ियां तोड़ दी। इतना कहते ही वह जमीन पर गिर गई और बेहोश हो गई। चिकित्सकीय जांच के बाद उसे मृत घोषित कर दिया गया।

नन्हें-नन्हें हाथों से डमरू ने मां की चिता को अग्नि दी। मैं बड़ी पशोपेश में थी कि मैंने सच बताकर कुछ अन्याय तो नहीं किया। वह बेबस महिला यह नहीं समझ पा रही थी कि मैंने उसके साथ क्या भला किया। वह तो उसी गलत फहमी में जीवित रहना चाहती थी, जिसमें किशन ठेकेदार उसे जीवित रखे हुए था।

आज डमरू उसी कांच फैक्ट्री में काम कर रहा है और कांच की चूड़ियां बनाकर हर नया डिजाइन मेरे पास लेकर आता है।

अब यह भेंट उस रिश्वत की खेप नहीं थी, बल्कि एक बेटे का मां के लिए तोहफा था।