जीवन का सबसे खूबसूरत हिस्सा बचपन को माना गया है। आजकल बच्चों के लिए अनेक तरीकों के नये-नये खिलौनों और गेम्स की भरमार है, वहीं अच्छे साहित्य और फिल्मों का अभाव है। बच्चों के लिए काफी कुछ लिखा भी जा रहा है और छप भी रहा है।

आज भौतिकवाद की चकाचौंध हर जगह दिखाई दे रही है। हर व्यक्ति जीवन की भागमभाग में शामिल है। विज्ञान के नित नए होने वाले अविष्कार ने सबको अस्त-व्यस्त कर दिया है।

हमारे पूर्वजों ने दिवाली सहित किसी धार्मिक आयोजन या लोकपर्व की परिकल्पना करते वक़्त अपने कारीगरों, शिल्पियों और कृषकों की रोज़ी-रोटी और सम्मान का पूरा ख्याल रखा था। उनके उत्पादों के बिना कोई भी पूजा सफल नहीं मानी जाती थी। औद्योगीकरण के आज के दौर ने बहुत कुछ बदल दिया है।

एक 93 साल के व्यक्ति ने विदेश में किताब निकाली। एक 95 साल के व्यक्ति ने मेरठ में निकाली। विदेश में किताब निकालना बहुत बड़ी बात, वहाँ सब किताब प्रेमी हैं, बच्चे किताबों के लती बनाए जाते हैं।

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