एक 93 साल के व्यक्ति ने विदेश में किताब निकाली। एक 95 साल के व्यक्ति ने मेरठ में निकाली। विदेश में किताब निकालना बहुत बड़ी बात, वहाँ सब किताब प्रेमी हैं, बच्चे किताबों के लती बनाए जाते हैं।

यहाँ रद्दी में जाने को एक कबाड़ तैयार करना, जिन्दे जी नहीं तो मरने पर। जिसे पढ़ने की किसी को फुरसत नहीं। किसी लेखक की ही कृपा हो जाए तो हो जाए जी। क्योंकि लिखने वाला खुद किताबें पढ़ता नहीं इसलिए लिखने वालों की नहीं पढ़ने वालों की जरूरत है। पढ़ने वाले तैयार किये जाने की जरूरत है जी। जिन्हें किताबें दी जाती हैं उनके यहाँ भी वे या तो सजती हैं या इधर उधर की जाती हैं बड़े लेखक के घर से रद्दी की ठेली में वे किताबें निकली थी जिन्हें समीक्षा के लिए भेजा गया था। लिखने वाले हर तीसरे घर में तैयार हो रहे हैं बावजूद इसके किताबें पढ़ी नहीं जा रही ये निर्विवाद सत्य है। किताब बनाना विमोचन करना फिर बांटना फिर समीक्षा किसी इक्के दुक्के से लिखवाना, दो चार अखबार में आ जाना कुछ लिक्खाड़ लोगों को पता चल जाना कि किताब आई है, दो चार पुरस्कार झटक सीना फुला कर आसमान हो जाना, न मिलने पर कुंठित हो जाना बस यही लेखक का प्रयोजन और किताब का योगदान अकारथ चला जाता है। मेहनत पैसा पानी में। अच्छी किताब की ही बात कर रही हूँ यही करते-करते एक दिन लेखक ऊपर चला जाता है कुछ लिखते हैं साहित्य जगत की अपूरणीय क्षति हुई। लेखक कथा समाप्त होती है तेरहवीं में बच्चे सोचते हैं अब इसके इकट्ठे किये कबाड़ का क्या निपटारा हो जिसमें उसकी और उसके पास आई किताबें होती हैं जिन्हें वह जीते जी कीमती सामान सा संभाल कर रखता है। बच्चो को अपनी फालतू किताबों का अपना बोझ इतना होता है रोजगार मिलने की उम्र तक सांस नहीं लेता।

अब लोग कहेंगे जब किताबें बिक नहीं रहीं तो इतने लोग लिख क्यों रहे हैं? जो ये सम्मान पुरस्कार की, आयोजन की चर्चा परिचर्चा आदि की कवायद, उनके द्वारा चेहरा बनाने बचाने को मुहिम चल रही है इससे लोग आकर्षित होते हैं। ये शॉल, मंच, फूलमाला और शील्ड उन्हें उकसा रही हैं। ऐसा नहीं कुछ अच्छा लिख नहीं रहे वे कैसा भी लिखें उसे पढ़ा ही नहीं जा रहा। जिस चीज का प्रयोग नहीं उसे बनाने का प्रयोजन अब सिर्फ चेहरा बनाना है केवल। बेस्टसेलर कोई नहीं सब थूक के पाथ रहे हैं कोई अखबार में परिचित तो जुगाड़ लगा बन रहे हैं। अब लेखक खुद महँगाई की वजह से डेढ़सो किताबें बनवाते हैं। केवल समीक्षा के लिए भेजने को इससे कम प्रकाशक बनाता नहीं। प्रकाशक किताब की पब्लिसिटी में दिलचस्पी नहीं लेता। पुराने लेखकों की नाम बदल बदल कर किताबें छापकर बेची जाती हैं उनकी किताबों की जुगाड़ू समीक्षा करके भी लेखक बन चेहरा बनाया जाता है। हर कोई चेहरा बनाने में लगा है। बस आत्मतुष्टि के अलावा कुछ नहीं है उपन्यास को तो आदमी छूता नहीं काव्य तो खत्म ही समझो।

गद्य फेसबुक पर पढ़ लो जितना चाहिए। ये सच स्वीकार करो न करो अटल सत्य है। तू मेरी पीठ खुजा मैं तेरी पीठ खुजाऊँ चल रहा है तू मुझे चमका मैं तुझे इसी कवायद में जुटे हैं लोग चाहे कितने बड़े हो या कितने छोटे जिनकी गैंग बन गई वे सरपट दौड़ रहे हैं केवल खुद उनकी किताबें नहीं वे तो वहीं हैं जहाँ लिखा है। सच एक और भी है लेखक का खुद का चरित्र वह गरीबों के आँसू बेचता है और उनकी मौत के सौदागरों का स्तुति पाठ वह कथनी करनी के अंतर के कारण हाशिये पर है मगर दिखा रहा है उठ रहा है। अपवाद हर चीज का है। निराला ग़ालिब हो जाने की तमन्ना तो है उनका जीवन चरित्र उनके अपने जीवन चरित्र में ढूंढें नहीं मिलता।

अपने समय के अनेक ऐसे लेखक जानती हूँ जो गरीबों पर कविताएँ तो लिखते गढ़ते हैं क्योंकि गरीबी से निकले हैं। अब तीस-तीस हजार में एक बुक्स बनाते फिर उसका इतने में ही विमोचन कराते हैं उनसे किसी गरीब को 500 रुपये नहीं निकलते। इसलिए भी इन खोखली रचनाओं को कोई तरजीह नहीं देता। अपने नाम चमकाने को अपने ऊपर लाखों खर्च करने वाला क्या ये नहीं जानता कि उसने खुद समाज के लिए क्या किया है। जो अपवाद हैं वो तो अपवाद ही हैं।

लोगों को पद्मश्री सहित्य भारती मिल जाता है और हम उन्हें पढ़ते नहीं। मैंने साहित्य भारती मिलने के बाद दूधनाथ जी की एक कहानी रीछ पढ़ी जिसमें सेक्स के अलावा कुछ नहीं था। मैत्रेयी की एक पुस्तक कहानी की पढ़ी वह भी इसलिए यशपाल जी जनवाणी ने भेंट की थी, सुधा ओम ढींगरा जी का उपन्यास जब अमेरिका में गई नक्काशी दार केबिनेट पढ़ा, तेजेन्द्र जी की कुछ कहानियां पढ़ी। और ये किताब की समस्या बड़े लेखकों की भी समस्या चाहे वे इसे बताएँ न बताएँ। अगर केंद्रीय हिंदी संस्थान ने मेरी खुद की किताबें न खरीदी होती तो रखीं होती दो साल से तो सब संस्थान दिवालिया हैं। तीन साहित्यिक संस्थाओं के मेंबर होने से उनके सदस्यों में बंट जाती हैं पचास साठ समीक्षा हेतु पत्र पत्रिकाओं में चली जाती हैं। 

सारे प्रश्न हुए हैं गोण
चीख रहा है भीतर मौन
आंखें दिखा रही रामायण
पुतली छिपा रही है पोर्न
सबने इक रचना रच दी है
शब्दों में अग्नि रख दी है
हर इक अक्षर पूछ रहा है
लेकिन उसे पढ़ेगा कौन