हमारे पूर्वजों ने दिवाली सहित किसी धार्मिक आयोजन या लोकपर्व की परिकल्पना करते वक़्त अपने कारीगरों, शिल्पियों और कृषकों की रोज़ी-रोटी और सम्मान का पूरा ख्याल रखा था। उनके उत्पादों के बिना कोई भी पूजा सफल नहीं मानी जाती थी। औद्योगीकरण के आज के दौर ने बहुत कुछ बदल दिया है।

हम भूलते जा रहे हैं कि उजालों के पर्व दीवाली में अपने देश के लाखों लोग ऐसे हैं जो हमारे जगमगाते घर की दुआओं के साथ अपने लिए आपकी थोड़ी चिंता और सहयोग के मुंतज़िर हैं। लगभग हाशिए पर खड़े हमारे कुम्हारों, शिल्पकारो और कलाकारों की रोज़ी-रोटी पिछले कई सालों से चीन ने अपनी बेहद आक्रामक बाज़ारवादी नीतियों की वजह से लगभग छीन रखी है। अपने शहर के ही बाज़ार की सैर पर निकलें तो ऐसा लगेगा कि हम भारत नहीं, चीन के किसी आर्थिक उपनिवेश की सैर पर हैं। पवित्रता की जगह बाज़ार और सादगी की जगह वैभव के भोंडे प्रदर्शन की अपसंस्कृति ने हमारी जड़ें छीन ली है हमसे।

अपने देश के कुटीर उद्योगों की बिगड़ती सूरत और ग्रामीण बेरोज़गारी के लिए हम कबतक अपनी सरकार की औद्योगिक नीति को कोसते रहेंगे ? लगभग बर्बादी के कग़ार पर खड़े अपने लाखों कामगारों और शिल्पकारों को सहारा देने के लिए हमें आगे आना होगा। अपनी ज़रा सी संवेदनशीलता से हम उनके उदास घरों में रोशनी और उनके बेनूर चेहरों पर फिर से मुस्कान लौटा सकते हैं। जाने कितने सपने देखें होंगे उन्होंने अपने बनाए दीयों, मूर्तियों, सजावट के सामानों और कलाकृतियों के आईने में। आईए इस दिवाली अपने घरों में मिट्टी के दीये जलाएं ! पूजा-कक्ष में अपने गरीब कारीगरों द्वारा निर्मित मूर्तियों को जगह दें। बच्चों के लिए मिट्टी और लकड़ी के कुछ खिलौने खरीद दें ! सजावट की ख़ातिर अपने शिल्पकारों द्वारा निर्मित कलाकृतियों का प्रयोग करें।

घटिया चीनी उत्पादों की तुलना में शायद ये थोड़े महंगे पड़ेंगे, लेकिन अपने ही देश के लाखों लोगों की खुशियों के आगे यह थोड़ी-सी ज्यादा क़ीमत कुछ भी नहीं। क्या पता हमारे छोटे-छोटे सहयोग से हमारे लोगों के कुछ बड़े-बड़े सपने पूरे हो जायं !